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गुरुवार, 08 मई, 2008 को 22:31 GMT तक के समाचार

'रामसेतु' पर सुप्रीम कोर्ट के अहम निर्देश

सेतुसमुद्रम परियोजना में गुरुवार को एक नया मोड़ आ गया जब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को दो अहम निर्देश जारी कर दिए.

एक तो यह कि सरकार भारतीय पुरातात्विक विभाग (एएसआई) को यह जाँच करनी चाहिए कि क्या रामसेतु को 'प्राचीन स्मारक' घोषित किया जा सकता है.

और दूसरा यह कि केंद्र सरकार को इस परियोजना के लिए वैकल्पिक रास्ते या नए एलाइनमेंट की तलाश करनी चाहिए.

उल्लेखनीय है कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने पिछले साल सितंबर में सुप्रीम कोर्ट को दिए गए हलफ़नामे में कहा था कि 'राम-सेतु' के ऐतिहासिक और पुरातात्विक अवशेष होने के कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं हैं.

इसके बाद राजनीतिक भूचाल खड़ा हो गया था और कई हिंदू संगठनों ने इसका कड़ा विरोध करते हुए इसे आस्था पर चोट क़रार दिया था.

दरअसल भारत और श्रीलंका के बीच भारत सरकार सेतुसमुद्रम परियोजना पर काम कर रही है. इसके तहत दोनों देशों के बीच उथले समुद्र को गहरा करके जहाज़ों के आने जाने का रास्ता बनाना है.

इसके तहत उस संरचना को भी तोड़ा जाना है जो हवाई चित्रों में पुल की तरह दिखाई देता है. हिंदू संगठनों का कहना है कि यह 'राम-सेतु' है जिसका ज़िक्र रामायण में है.

कुछ पर्यावरणविद भी इस परियोजना का विरोध कर रहे हैं कि इससे पर्यावरणीय असंतुलन होगा.

नए निर्देश

सुप्रीम कोर्ट के नए निर्देश केंद्र सरकार के उस जवाब के बाद आए हैं जिसमें सरकार ने कहा था कि विशेषज्ञ समिति ने परियोजना की समीक्षा की है जिसमें भारत और श्रीलंका के बीच समुद्र में एलाइनमेंट नंबर छह को ही परियोजना के लिए उचित पाया गया है.

मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाले तीन सदस्यीय पीठ ने सरकार की ओर से पेश वरिष्ठ वकील फाली नरिमन से कहा कि सेतुसमुद्रम परियोजना के लिए वैकल्पिक एलाइनमेंट की संभावना तलाशनी चाहिए.

समाचार एजेंसियों के अनुसार पीठ का कहना था कि इसके ज़रिए सरकार रामसेतु को नुक़सान होने के विवाद से बच सकती है.

सुप्रीम कोर्ट के पीठ ने कहा, "सुब्रमण्यम स्वामी और वरिष्ठ वकील सीएस वैद्यनाथन का कहना है कि परियोजना के लिए वैकल्पिक एलाइनमेंट पर विचार ही नहीं किया गया."

"दूसरा मद्रास हाईकोर्ट के पुरातात्विक सर्वेक्षण करवाने के निर्देश का पालन नहीं किया गया."

उल्लेखनीय है कि सुप्रीम कोर्ट में आने से पहले इस मामले की सुनवाई मद्रास हाईकोर्ट में चल रही थी.

हालांकि केंद्र सरकार का तर्क था कि हाईकोर्ट के निर्देश के बाद सरकार ने एक विस्तृत हलफ़नामा पेश किया था लेकिन सुप्रीम कोर्ट के पीठ ने कहा कि चूँकि उस निर्देश को ख़ारिज नहीं किया गया है इसलिए उस पर अमल किया जाना चाहिए.