http://www.bbcchindi.com

मंगलवार, 06 मई, 2008 को 04:56 GMT तक के समाचार

तूफ़ान के बाद तबाही का मंज़र

बर्मा के आए तूफ़ान ने ज़बरदस्त तबाही मचाई है. रंगून को मिलाकर पाँच इलाक़ों में आपातकाल घोषित है. हज़ारों घर तबाह हो गए हैं.

टेलिफ़ोन और दूसरी संचार व्यवस्था बुरी तरह प्रभावित हुई है. इन कठिन हालात के बावजूद बीबीसी कुछ ऐसे लोगों तक पहुँचने में कामयाब रहा जो इस तबाही के मंज़र के गवाह रहे हैं.

रंगून में रहने वाले एक बुज़ुर्ग

"मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में ऐसी तबाही नहीं देखी."

रंगून में स्वीडन सरकार के पूर्व मंत्री जेंल ओरबैक

जिस वक्त तूफ़ान आया उस वक्त स्वीडन सरकार के पूर्व मंत्री जेंस ओरबैक रंगून में ही थे.

ओरबैक कहते हैं, "हम अपने होटल के अंदर होते हुए भी बुरी तरह फंस गए थे. हम एक जगह से दूसरी जगह ही नहीं जा पा रहे थे क्योंकि हर तरफ से खिड़कियों और दरवाज़े के काँच टूट कर गिर रहे थे."

वो कहते हैं, "हम सैकड़ों वर्षों से खड़े पेड़ों को गिरता हुआ देख रहे थे. तूफ़ान आने के 10 से 12 घंटे तक तो प्रशासन की तरफ से किसी तरह की कोई मदद नहीं पहुँची. कहीं कोई पुलिसवाला या सेना का कोई जवान दिखाई नहीं दे रहा था. लोग घरों से निकल कर सड़कों पर गिरे पेड़ों को हाथ की छोटी आरी से ही काटने में जुटे हुए थे."

इरावडी के लापुत्ता इलाक़े के एक व्यक्ति

इस शख्स का कहना था, "शहर का तक़रीबन 80 फ़ीसदी हिस्सा पूरी तरह तबाह हो चुका है. अनेक घरों की छतें उड़ चुकी हैं. रिहायशी इलाक़ों में घर ढांचों की तरह खड़े दिखाई दे रहे हैं."

वो कहते हैं,"इरावडी के बाहरी हिस्से में बसे 16 गाँव पूरी तरह तूफ़ान की भेंट चढ़ चुके हैं. समुद्री तट पर तबाही ही तबाही दिखाई पड़ती है. कोई हमारी मदद नहीं कर रहा है."

रंगून के नज़दीक के निवासी

इस इलाक़े के लोगों का कहना है, "तूफ़ान की चपेट में आने से कोई घर नहीं बच पाया है. कुछ घर तो पूरी तरह जड़ से उखड़ चुके हैं."

स्थानीय प्रशासन लोगों को धार्मिक स्थलों पर शरण दिलवा रहा है. सड़कों पर इक्का-दुक्का बसें ही चल रही हैं. जो चल भी रही हैं तो उन्होंने अपना किराया पाँच गुना तक बढ़ा दिया है.

"घरों की छत को बनाने के लिए इस्तेमाल होने वाले लोहे के दाम आसमान छूने लगे हैं. यहाँ तक कि कीलें ख़रीदना भी अब मुश्किल हो रहा है."

रंगून की एक महिला-

"बौद्ध भिक्षु हर तरफ़ मदद के लिए आगे आ रहे हैं. केमेडीन और सांनचुंग इलाक़ों में मैंने तक़रीबन 200 भिक्षुओं को लोगों की मदद और राहत के काम में लगे देखा है."

"वो खुद अपने हाथों से सड़क पर गिरे पेड़ों को काट-काटकर हटा रहे हैं."

"जबकि, इस तरह की आपदा से निपटने के लिए बनाया गया सेना का दस्ता हाथ पर हाथ धरे सिर्फ़ देख रहा है. हालांकि, इस दस्ते में आम आदमी भी शामिल है लेकिन वो कुछ नहीं कर पा रहा है."

रंगून में ही तैनात अमरीकी अधिकारी शारी विलारोसा

"बिजली नहीं है. संचार के साधन नाकाफ़ी हैं. आसपास के कई इलाक़ों में पीने का पानी तक उपलब्ध नहीं है."

"तूफ़ान के बाद दोपहर तक आसमान साफ़ हुआ. जब हम घऱ से बाहर निकले तो सब पूरी तरह हैरान थे."

"मेरे पड़ोस में रहने वाले लोगों ने बताया कि पिछले 15 सालों में उन्होंने इस तरह की तबाही नहीं देखी."

रंगून के ही रहने वाले एक शख्स

"रंगून पूरी तरह से कट गया है. पीने का पानी नहीं है. सड़कें बंद हैं. कहीं जा नहीं सकते. हर चीज़ महँगी हो गई है."

"पानी सप्लाई करने वाली पाइप लाइनें सूखी पड़ी हैं. अगर हम अपने पंप से पानी ले भी लेते हैं तो पानी की निकासी के लिए कोई रास्ता तक नहीं है. हम नहा तक नहीं सकते."