बीनू जोशी
बीबीसी संवाददाता, जम्मू
भारत प्रशासित कश्मीर में पहली बार महिला पुलिस की एक बटालियन बनाई जा रही है.
इसमें शामिल होने के लिए दूरदराज़ के पहाड़ी इलाक़ों से लड़कियाँ आ रही हैं और ज़िला मुख्यालयों में भर्ती का काम ज़ोर-शोर से चल रहा है.
पुलिस का कहना है कि इससे पिछड़े क्षेत्रों में महिलाओं को रोज़गार मिलेगा और उनका सशक्तिकरण भी होगा.
किश्तवार में इस बटालियन की भर्ती का काम पूरा भी हो चुका है. यहाँ 81 महिलाओं को चुना गया है.
चुनी गई महिलाओं को पुलिस प्रशिक्षण अकादमी में नौ महीने तक प्रशिक्षण दिया जाएगा और उसके बाद ये औपचारिक रूप से पुलिस में अपने काम पर लग जाएँगी.
सबसे ख़ास बात ये है कि पुलिस में भर्ती होने के लिए महिलाओं में ज़बर्दस्त जोश देखने को मिला.
तेज़ सर्द हवाओं के बावजूद छात्रू, दचन, मारवाह और पद्दर जैसे दूर-दराज़ के इलाक़ों से बड़ी संख्या में महिलाएँ भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने पहुँची थीं.
इनमें से कुछ महिलाएँ तो उन इलाक़ों से भी आई थीं जहाँ कभी चरमपंथी हिंसा का काफ़ी ज़ोर था.
टूटते मिथक
आम तौर पर भारतीय परिवार में महिलाओं का पुलिस और सेना जैसी सेवाओं जाना अच्छा नहीं माना जाता.
वैसे भी कश्मीर के इन इलाक़ों में महिलाएँ कई तरह के भय और संकोच में बंधी होती हैं.
लेकिन इस सब के बावजूद चरमपंथियों के डर और ख़ौफ़ को पीछे छोड़कर आना कम हैरान कर देने वाला नहीं है.
भर्ती प्रक्रिया में शामिल होने वाली महिलाएँ हिंदू, मुस्लिम और सिख परिवारों से थीं.
दरअसल, भारत प्रशासित कश्मीर की सरकार इस भर्ती के ज़रिए महिलाओं को रोज़गार भी देना चाहती है.
किश्तवार में अपनी देख-रेख में भर्ती करवाने वाले कमांडेंट महेश शर्मा के मुताबिक़, "क़ानून व्यवस्था और अन्य ऑपरेशन में कई जगह महिलाओं की ज़रूरत होती है."
किश्तवार में भर्ती प्रक्रिया के दौरान कतार में खड़ी इन महिलाओं के चेहरे पर खुशी, उत्साह और ज़बर्दस्त जोश दिखाई दे रहा था.
कुछ महिलाएँ तो घाटी के दूर-दराज़ इलाक़े से पैदल चलकर आई थीं.
'देश के लिए'
इस भर्ती प्रक्रिया के दौरान महिलाओं का कद नापा गया. इसके बाद उनकी 100 और 200 मीटर की दौड़ कराई गई.
उन्हें ऊंची कूद और लंबी कूद में भी अपने आप को साबित करना पड़ा.
18 से 28 साल की उम्र की इन महिलाओं में तो कुछ शादीशुदा भी थीं. भर्ती में शामिल ऐसी ही एक महिला शकीला भी थी.
शकीला का छह महीने पहले ही निकाह हुआ है. वो कहती हैं, "मैं बंदूक उठा कर लड़ सकती हूँ, मिलिटेंसी से लड़ूँगी, लड़ाई-झगड़ों को दूर करूँगी."
कुछ इसी तरह के ख़्यालात हैं साज़िया के. साज़िया कहती हैं, " जो भी ऑर्डर होगा वो करूँगी, अपने देश के लिए."
भर्ती के दौरान लड़कियाँ सलवार-कमीज़ पहन कर आई थीं और कई ने तो अपने सिर को दुपट्टे से ढंक रखा था.
'पैंट-कमीज़...क्यों नहीं'
पुलिस में शामिल होने पर ड्यूटी के दौरान इनके पास ख़ाकी शलवार-कमीज़ पहनने का विकल्प तो है. लेकिन क़ानून व्यवस्था और ऑपरेशन के दौरान इन्हें पैंट-कमीज़ पहननी होगी.
पैंट-कमीज़ पहनने के बारे में पूछने पर सभी ने कहा, "क्यों नहीं. ड्यूटी के लिए हम पैंट-कमीज़ भी पहनेंगे."
कश्मीर के पिछड़े इलाक़ों से पुलिस की भर्ती में शामिल होकर इन लड़कियों ने साबित कर दिया है कि वो डर और ख़ौफ़ के अलावा संकोच की तमाम दीवारें तोड़कर आई हैं.
माना जा रहा है कि इससे महिलाओं के सशक्तिकरण को एक नई दिशा मिलेगी.