सोमवार, 14 अप्रैल, 2008 को 08:55 GMT तक के समाचार
बिहार के शहर मोतिहारी में डॉक्टर उन छह नवजात शिशुओं को बचाने की कोशिश कर रहे हैं जिन्हें एक महिला ने आधे घंटे के अंतराल में जन्म दिया है.
मोतिहारी के एक निजी नर्सिंग होम में रविवार की शाम सुनीला देवी नामक एक महिला ने जब छह लड़कियों को जन्म दिया तो शहर के बहुत से लोग बड़ी संख्या में उन्हें देखने जमा हो गए.
लोग छह बच्चों के एकसाथ पैदा होने के साथ इस बात पर भी हैरान थे कि वे सभी लड़कियाँ हैं.
मोतिहारी के सिविल सर्जन डॉक्टर वेदनाथ सिंह ने बताया कि जच्चा और बच्चों दोनों का स्वास्थ्य ठीक है लेकिन वे कमज़ोर हैं.
उन्होंने बताया कि ज़िला प्रशासन के निर्देशों के अनुसार डॉक्टरों की टीम बच्चियों की देखभाल कर रही है.
इलाज की ज़रूरत
डॉक्टर वेदनाथ सिंह ने बताया कि सुनीला के शरीर में हीमोग्लोबिन की कमी है और सूजन भी काफ़ी है.
डॉक्टर ने बताया, " हम जच्चा और बच्चा के बेहतर इलाज की हरसंभव कोशिश कर रहे हैं. लेकिन इसके लिए उन्हें पटना या किसी बेहतर अस्पताल में भेजा जाना ज़रूरी है.''
सुनीला देवी ने जिस नर्सिंग होम में इन बच्चियों को जन्म दिया है वहाँ की डॉक्टर एस लाल के मुताबिक़ सुनीला शहर से कुछ दूर स्थित टिकोलिया हिराज गाँव की रहने वाली हैं और उनके पति हवलदार राय पंजाब में मजदूरी करते हैं.
डॉक्टर लाल के अनुसार बच्चे सामान्य हैं और सभी बच्चे का वजन क़रीब 1200 ग्राम है.
सुनीला और बच्चों की देखभाल जिस नर्सिंग होम में हो रही है वहाँ की डॉक्टर रंभा ने बताया कि क़रीब दस साल पहले ऑस्ट्रेलिया में एक महिला ने सात बच्चों को जन्म दिया था लेकिन कमज़ोरी और बीमारी की वजह से वे ज़िंदा नहीं रह पाए थे.
दुर्लभ घटना
उन्होंने कहा कि रविवार को मोतिहारी में पैदा हुई बच्चियाँ ऑस्ट्रेलिया में पैदा हुए उन बच्चों के मुकाबले ज़्यादा स्वस्थ हैं.
उन्होंने कहा कि तीन बच्चों का एकसाथ जन्म तो देखा-सुना गया है लेकिन छह बच्चों का एकसाथ पैदा होना दुर्लभ है.
श्रीकृष्ण मेडिकल कॉलेज में बालरोग विभाग के प्रमुख डॉ ब्रजमोहन कहते हैं कि इन छह बच्चियों का पैदा होना कुदरत का करिश्मा है.
उन्होंने कहा कि सुनीला की आर्थिक स्थिति देखते हुए बच्चों की देखभाल मुश्किल काम है.
डॉक्टरों के मुताबिक सुनीला ने इससे पहले तीन बेटों को जन्म दिया था लेकिन उनमें से कोई बच नहीं सका था.
सुनीला अपनी बच्चियों के ज़िंदा रहने और उनके पालन-पोषण को लेकर परेशान हैं.
उनका कहना है कि लोग बच्चियों को देखने तो आते हैं लेकिन शगुन के रुपए तक नहीं देते हैं.