सोमवार, 14 अप्रैल, 2008 को 11:38 GMT तक के समाचार
रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी संवाददाता, लखनऊ
उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती ने पुरानी परंपराओं को दरकिनार करते हुए जीतेजी ही सरकारी खर्चे से सार्वजनिक स्थान पर अपनी प्रतिमा स्थापित करवा दी है.
प्रतिमा का अनावरण प्रसिद्ध दलित नेता डॉ भीमराव अंबेडकर की जयंती के अवसर पर आयोजित जलसों के साथ किया गया.
डॉक्टर अंबेडकर ने भारत की स्वतंत्रता में और देश के संविधान को बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी.
प्रदेश की राजधानी लखनऊ में गोमती नदी के किनारे उत्तर प्रदेश सरकार के बनाए सामाजिक परिवर्तन स्थल पर मायावती के साथ साथ सत्तारूढ़ बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक स्वर्गीय कांशी राम की प्रतिमा लगाई गई है.
वहीं सड़क की दूसरी ओर डॉ अंबेडकर और उनकी पत्नी रमा बाई की आदमकद प्रतिमाएँ भी लगाई गयी हैं.
इसी के साथ मुख्यमंत्री मायावती ने नवीनीकृत डाक्टर भीम राव सामाजिक परिवर्तन स्थल का लोकार्पण कर दिया.
इस स्थल का निर्माण काफ़ी विवादास्पद रहा है. इसके निर्माण पर लगभग सात सौ करोड़ रुपए की लागत बताई जा रही है.
स्टेडियम विवाद
इसके विस्तार के लिए मायावती अंबेडकर स्टेडियम को तोड़ रही थीं जिस पर कोर्ट ने रोक लगा दी थी.
इसके अलावा सरकार बगल की ग्रीन बेल्ट की जमीन भी इसमे मिलाना चाहती थी, मगर कोर्ट ने उस पर भी फिलहाल रोक लगा रखी है.
मायावती ने अपने भाषण मे इन सब बातों का हवाला देते हुए विरोधी समाजवादी और कांग्रेस पार्टी को आड़े हाथों लिया.
मायावती ने एक बार फिर कांग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि देश में दलितों को जो कुछ भी हासिल हुआ वह सब केवल बाबा साहेब डाक्टर अंबेडकर की बदौलत हुआ है, न कि कांग्रेस पार्टी या गाँधी नेहरू खानदान की बदौलत.
मायावती के मुताबिक कांग्रेस के नेता डॉक्टर अंबेडकर को संविधान सभा में नहीं आने देना चाहते थे, पर डाक्टर अंबेडकर लंदन मे अंग्रेज़ों से मिले और उनके दबाव से कांग्रेस ने उन्हें संविधान सभा में लिया.
फिर भरी सभा में उन्होंने अपनी प्रतिमा लगाये जाने को उचित ठहराया. उन्होंने कहा कि जीते जी प्रतिमा न लगाने की रूढिवादी परंपरा को बदलने की सलाह उन्हें उनके राजनीतिक गुरु कांशी राम ने दी थी.
'भावी प्रधानमंत्री'
मायावती के मुताबिक, " कांशीराम यह भी चाहते थे कि उनके बगल में ही मेरी प्रतिमा भी लगाई जाए. इसीलिए उनके आदर सम्मान में जहाँ जहाँ उनकी प्रतिमा लगाई जाएगी वहाँ वहाँ मेरी भी प्रतिमा लगाई जाएगी."
समारोह में मायावती के अलावा बहुजन समाज पार्टी के किसी भी अन्य नेता को बोलने का मौक़ा नहीं दिया गया.
इससे पहले गीतों के माध्यम से मायावती को भावी प्रधानमंत्री के रूप मे पेश किया गया.
कार्यक्रम पूरी तरह से राजनीतिक रंग लिए हुए था, लेकिन सरकार के वरिष्ठ अफसर मंच पर विराजमान थे.
दूर दूर से आए बहुजन समाज पार्टी कार्यकर्ता कांशीराम के साथ साथ मायावती की प्रतिमा देखकर खुश थे और इसे उचित बता रहे थे.
'इतिहास का ज्ञान नहीं'
मगर वहीं ड्यूटी कर रहे एक माली को यह बिल्कुल नापसंद था. उसका कहना था कि यह तो मृत्यु के बाद होता है. मरने से पहले वही अपनी मूर्ति लगवाता है, जिसका कोई न हो.
उधर पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता रामनरेश यादव ने कहा कि इससे झलकता है कि मायावती को घमंड हो गया है लेकिन जनता को यह पसंद नहीं है.
रामनरेश यादव ने सलाह दी कि मायावती मूर्तियाँ लगाने के बजाए बुदेलखंड के सूखे और दूसरी समस्याओं पर ध्यान दें.
यादव का कहना है कि मायावती को इतिहास का ज्ञान नहीं है. उन्हें नहीं मालूम कि डाक्टर अंबेडकर को संविधान सभा का सदस्य, ड्राफ्ट कमिटी का अध्यक्ष और फिर क़ानून मंत्री कांग्रेस ने ही बनाया था.
विपक्षी दलों का कहना है कि यह ऐसे देश की जनता के धन का दुरुपयोग है जहाँ लाखों लोग ग़रीबी में जी रहे हैं.