गुरुवार, 10 अप्रैल, 2008 को 06:41 GMT तक के समाचार
भारतीय सुप्रीम कोर्ट ने उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्गों (ओबीसी) के लिए 27 फ़ीसदी आरक्षण को वैध ठहराया है, लेकिन संपन्न लोगों को यानी 'क्रीमी लेयर' इस दायरे से बाहर होंगे.
कई छात्र संगठनों और समूहों ने उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी को आरक्षण देने के सरकार के फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी.
सुप्रीम कोर्ट की पाँच न्यायाधीशों की संवैधानिक पीठ ने गुरुवार को दिए अहम फ़ैसले में कहा कि इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियरिंग (आईआईटी), भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम) और एम्स जैसे केंद्रीय उच्च शिक्षण संस्थानों में ओबीसी को आरक्षण देने के केंद्र सरकार के फ़ैसले से संविधान का उल्लंघन नहीं होता है.
हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने ओबीसी के वैसे छात्र-छात्राओं को आरक्षण की सुविधा नहीं देने को कहा है जो आर्थिक रुप से संपन्न हैं और 'क्रीमी लेयर' के दायरे में आते हैं.
क्रीमी लेयर
हालाँकि क्रीमी लेयर अनुसूचित जाति और जनजाति के छात्रा-छात्राओं के लिए लागू नहीं होगी.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि क्रीमी लेयर की परिभाषा वर्ष 1993 में निर्धारित मानकों के आधार पर ही तय होगी.
अदालत ने सरकार से कहा है कि हर पाँच वर्ष के बाद ओबीसी सूची की समीक्षा की जाए.
ओबीसी के दायरे में सैंकड़ों जातियाँ आती हैं और समय के साथ-साथ इसकी संख्या बढ़ी है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अन्य पिछड़ा वर्ग के बजाए इनको सामाजिक-शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग कहा जाना चाहिए.
कांग्रेस के प्रवक्ता और इस मामले में सरकारी वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने पत्रकारों से कहा, "ये फ़ैसला मील का पत्थर है. ये कांग्रेस और यूपीए सरकार की पहल थी जिसे सुप्रीम कोर्ट ने नीतिगत तौर पर सही ठहराया है."