बुधवार, 09 अप्रैल, 2008 को 15:52 GMT तक के समाचार
आकाश सोनी
बीबीसी संवाददाता, लंदन
पहला भारत-अफ़्रीका शिखर सम्मेलन दिल्ली में ख़त्म हो गया. भारत के बुलावे पर 14 अफ़्रीकी देशों के राष्ट्रप्रमुख दिल्ली आए. दो साल पहले जब पहला चीन-अफ़्रीका शिखर सम्मेलन आयोजित किया गया था तो 40 राष्ट्राध्यक्ष बीजिंग आए थे.
भारत के बुलाने पर 14, चीन के बुलाने पर 40 – फ़र्क शायद सम्मेलन से पूर्व की गई तैयारी का था. सवाल यही है कि क्या ऐसे में भारत क्या अफ़्रीका में अपनी जगह बना पाएगा.
चीन अपनी नई अफ़्रीका नीति के तहत जितनी तेज़ी से अफ़्रीका में अपनी जगह बना चुका है, उसे अफ़्रीका में रह रहे भारतीय मूल के व्यवसायी भी देख रहे हैं, हैरान हैं.
सात दशक से पाटनी परिवार का कीनिया में व्यापार है. परिवार के बुज़ुर्ग व्यवसायी प्रभुदास पाटनी कहते हैं चीन इस दौड़ में काफ़ी आगे निकल चुका है, चीन की कंपनियाँ और लोग अफ़्रीका पर तेज़ी से छाते जा रहे हैं.
प्रभुदास पाटनी की तरह भारतीय मूल के मूलजी भाई पिंडोलिया भी चीन के बढ़ते प्रभुत्व के गवाह हैं.
क्या भारत ने चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए ही ये शिखर सम्मेलन आयोजित किया है?
पूछने पर भारत के विदेश मामलों के राज्य मंत्री आनंद शर्मा कहते हैं,
“ हम अफ़्रीका में किसी देश के साथ प्रतिस्पर्धा के लिए नहीं उतरे हैं ना ही हम कुछ साबित करना चाहते हैं. भारत अपनी आज़ादी से
पहले से ही साम्राज्यवाद का मुकाबला करने में अफ़्रीका के साथ खड़ा था – भारत और अफ़्रीका के रिश्ते बहुत पुराने हैं.”
चीन से मुकाबला
जानकार तो भारत के विदेश मामलों के मंत्री आनंद शर्मा से एक क़दम आगे बढ़कर कहते हैं कि भारत और अफ़्रीका कई शताब्दियों से व्यापार करते रहे हैं.
लेकिन साथ ही वो ये भी कहते हैं कि आज की तारीख में चीन का अफ़्रीका के साथ व्यापार भारत के मुकाबले दोगुना से भी ज़्यादा है.
तो क्या अब बहुत देर हो चुकी है? भारत-अफ़्रीका शिखर सम्मेलन एक निर्रथक प्रयास है? जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर अजय दुबे कहते हैं नहीं.
अफ़्रीका में भारतीय मूल के व्यवसायी मूलजी भाई पिंडोलिया का भी यही मानना है.
अमरीका और यूरोप भी अफ़्रीका को लेकर चिंतित हैं. एक उदाहरण लीजिए. 2007 के अंत में अफ़्रीकी देश कॉन्गो की सरकार ने कहा कि चीन ने उसे एक पेशकश की है.
चीन 12 अरब डॉलर की लागत से कांगो की सड़कें, रेल और खदानों के काम में मदद करेगा, बदले में चीन 12 अरब डॉलर का तांबा कांगो की खदानों से निकालेगा.
12 अरब डॉलर कांगो के सालाना बजट का तीन गुना है.
पश्चिमी देशों के सलाहकार गुटों ने अगले तीन साल में हर साल कांगो को जितना पैसा देने का वादा किया था, चीन उससे दस गुना ज़्यादा दे रहा था. ऐसे में कांगो चीन को अपना सबसे करीबी मित्र न मानता तो क्या करता.
भारत क्या करे..
अमरीका पैसे के साथ साथ अफ़्रीका में नेटो सैनिकों के अड्डे बनाकर देशों को अपने साथ जोड़ना चाहता है. ऐसे में भारत क्या करे?
नाइजीरिया की अबुजा युनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर नूहू ओ याक़ूब कहते हैं, “ भारत का दक्षिण अफ़्रीका के साथ विशेष रिश्ता है, नाइजीरिया के साथ भारत के शताब्दियों से अच्छे रिश्ते रहे हैं और पूर्वी अफ़्रीका में भारतीय मूल के कई लोग रहते हैं जिनके कारण भारत को काफ़ी फ़ायदा मिल सकता है.”
लेकिन नाइजीरिया के प्रोफ़ेसर नूहू ओ याक़ूब जिस फ़ायदे की बात कर रहे हैं, भारतीय मूल के लोगों का कहना है कि भारत सरकार उसकी ताकत को अब भी समझ नहीं पाई है.
साथ ही एक बात और है. पश्चिमी देश आरोप लगाते रहे हैं कि चीन व्यावसायिक समझौते करते वक़्त न तो मानवाधिकारों की फ़्रिक्र करता है और न भ्रष्ट नेताओं से उसे कोई आपत्ति है.
लेकिन अफ़्रीका मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर अजय दुबे का कहना है कि ये पश्चिमी देशों का विचार है जिससे वो सहमत नहीं हैं.
बहरहाल वो कहते हैं कि भारत को वो रास्ता चुनना होगा जो साफ़-सुथरा और पारदर्शी हो.
भारतीय मूल के व्यवसायी मूलजी भाई पिंडोलिया कहते हैं कि अफ़्रीका में बसे भारतीय मूल के लोग कहते हैं कि अगर भ्रष्ट नेताओं की बजाय अफ़्रीका के लोगों की ओर ध्यान दिया जाए तो कुछ समय ज़्यादा लग सकता है. लेकिन वो रिश्ते ज़्यादा समय के लिए मधुर बने रहेंगे जिसका लंबे समय में ज़्यादा फ़ायदा हो सकता है.