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मंगलवार, 08 अप्रैल, 2008 को 09:12 GMT तक के समाचार

सलमान रावी
बीबीसी संवाददाता, झारखंड

माओवादियों की गोलीबारी, आठ मरे

झारखंड में सीपीआई (एमएल) और शांति सेना संगठन के बीच हुई गोलीबारी में कम से कम आठ लोगों के मारे जाने की ख़बर है.

जानकारी के मुताबिक राज्य के गुमला ज़िले में प्रतिबंधित संगठन, भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के एक छापामार दस्ते और शांति सेना के बीच चल गोलीबारी हुई.

कहा जाता है कि नागरिक सुरक्षा समिति और शांति सेना छत्तीसगढ़ में चल रहे सलवा जुडूम के झारखण्ड संस्करण जैसे हैं.

पुलिस पर आरोप लगते रहे हैं कि वो इन संगठनों को हथियार और अन्य मदद उपलब्ध कराती रही है ताकि माओवादियों के ख़िलाफ़ एक संगठन खड़ा हो सके और इस तरह से माओवादियों को नुकसान पहुंचे.

गोलीबारी पालकोट के जंगलों में मंगलवार की सुबह नौ बजे के आस-पास तब शुरू हुई जब शांति सेना के लोगों ने माओवादियों के एक छापामार दस्ते को घेरने की कोशिश की.

पुलिस का कहना है की अभी तक जो खबरें आ रही हैं उनसे पता चलता है की मरने वालों में शांति सेना के प्रमुख भादो सिंह शामिल है. दोनों तरफ़ से अभी तक गोलीबारी जारी है. पुलिस और अर्धसैनिक बालों की टुकड़ियों को घटनास्थल के लिए रवाना कर दिया गया है.

जहां पर यह गोलीबारी चल रही है वो इलाक़ा राजधानी रांची से लगभग 150 किलोमीटर पश्चिम की ओर है. ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि गोलीबारी में कई लोग घायल हुए हैं और हताहतों की संख्या बढ़ भी सकती है.

दूसरी तरफ़ राज्य के गढ़वा ज़िले से आ रही ख़बरों के अनुसार मंगलवार सुबह पुलिस और माओवादियों के बीच भाबुहा घाटी में घंटों चली मुठभेड़ के बाद पुलिस ने कई आधुनिक हथियार और गाड़ियाँ बरामद की हैं. हालांकि इस मुठभेड़ में किसी के घायल होने की ख़बर नहीं है.

माओवादियों में बिखराव

भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के बीच चल रहे अंतरविरोधों के चलते पार्टी के कई शीर्ष नेताओं ने संगठन से नाता तोड़ते हुए अलग-अलग गुट बना लिए हैं जो झारखंड के विभिन्न क्षेत्रों में सक्रिय हैं.

झारखंड लिबरेशन टाइगर्स, तृतीय प्रस्तुति कमेटी, झारखंड प्रस्तुति कमेटी, झारखंड जनमुक्ति मंच और शांति सेना कहने को तो माओवादियों से अलग हुए गुट हैं मगर इन सभी संगठनों ने माओवादियों द्वारा वसूली जा रही लेवी पर अपना भी दावा ठोंक दिया है.

यही कारण है की माओवादियों और इन गुटों में लेवी उगाही में वर्चस्व को लेकर काफ़ी ज़ोरदार संघर्ष चल रहा है.

इन संघर्षों ने पिछले एक साल की अवधि में ही काफ़ी खून-खराबा देखा है जिसमें दोनों तरफ से कई लोग हताहत हुए हैं.

ऐसा भी कहा जा रहा है कि ख़ुद झारखंड पुलिस ही इन टूटे हुए गुटों को प्रोत्साहित कर रही है ताकि उसे इनके आपसी संघर्षों से लाभ मिल सके.

ऐसे आरोप लग रहे हैं कि नागरिक सुरक्षा समिति और शांति सेना जैसे कुछ गुटों को प्रशिक्षण और हथियार मुहैया कराने का काम पुलिस ही कर रही है.

हालांकि राज्य के पुलिस प्रवक्ता राज कुमार मल्लिक इन आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहते हैं कि समय-समय पर पुलिस इन गुटों के ख़िलाफ़ भी कार्रवाई करती रही है.