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मंगलवार, 08 अप्रैल, 2008 को 14:37 GMT तक के समाचार

आकाश सोनी
बीबीसी संवाददाता, लंदन

अफ़्रीका से बेहतर संबंध फ़ायदे का सौदा

दिल्ली में इनदिनों भारत-अफ़्रीका शिखर सम्मेलन चल रहा है. लेकिन आपके मन में शायद ये सवाल आए कि आख़िर कौन पूछता है अफ़्रीका को जनाब?

पर भारत में कुछ जानकारों की मानें तो ये सम्मेलन इस साल की शायद सबसे बड़ी कूटनीतिक और रणनीतिक घटना हो सकती है.

भविष्य में कौन सा देश ताकतवर रहेगा या नहीं ये तय होगा इस बात से कि किसके रिश्ते अफ़्रीका से कितने मज़बूत हैं.

अगर आप अब भी सोचते हैं कि अफ़्रीका पिछड़ा हुआ महाद्वीप है, बस जंगली जानवर देखने या सैर-सपाटे की जगह है , तो शायद अपना नज़रिया बदलने की ज़रूरत है.

आज की तारीख़ में चीन, अमरीका और भारत जैसे कई देश अफ़्रीका के लिए एड़ी चोटी का ज़ोर लगाने को तैयार हैं.

तो क्या है अफ़्रीका के पास, जो भारत को चाहिए?

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के अफ़्रीका मामलों के जानकार प्रोफ़ेसर अजय दुबे कहते हैं, “अफ़्रीका के पास वो सब कुछ है जो एक बड़ी और बढ़ती अर्थव्यवस्था को चाहिए जिसमें सबसे पहले ऊर्जा है.”

दिल्ली के प्रोफ़ेसर दुबे के सुर से सुर मिलाते हैं नैरोबी से मूलजी भाई पिंडोलिया.

कीनिया में कई दशकों से व्यापार और उद्योग से जुड़े भारतीय मूल के मूलजीभाई पिंडोलिया कहते हैं, " अफ़्रीका के पास लगभग हर चीज़ बनाने के लिए कच्चा माल और खनिज पदार्थ है."

इसके अलावा खेती से जुड़े कई क्षेत्रों में भी भारत के पास आगे बढ़ने के कई रास्ते हैं.

भारत को फ़ायदा

हाल के वर्षों में जिस तेज़ी से चीन ने अमरीका को पीछे छोड़ते हुए अफ़्रीका में क़दम बढ़ाए हैं उससे अफ़्रीका को अपने महत्व का एहसास और हुआ है.

दिल्ली आए अफ़्रीकी संघ के जॉन शिंकिया कहते हैं, “ अफ़्रीका एक बहुत अमीर महाद्वीप है. हमने अभी तक अपने संसाधनों का पूरा उपयोग नहीं किया है. लेकिन हम देशों के साथ साझेदारी कर इन संसाधनों का उपयोग करना चाहते हैं और उसके लिए आधारभूत ढाँचा तैयार करना ही अफ़्रीका भारत शिखर सम्मेलन का उद्देश्य है.”

पिछले पाँच सालों में जितना पैसा चीन ने अफ़्रीका में निवेश किया है और सहायता के लिए दिया है वो कुल मिलाकर अमरीका से भी कहीं ज़्यादा है.

अमरीका ने जब ये देखा तो उसने अपनी सामरिक शक्ति के बल पर अफ़्रीका को लुभाने की कोशिश की है.

भारत के पास न चीन जितना पैसा है और न ही अमरीका जैसी सैनिक और कूटनीतिक शक्ति.

शायद यही कारण है कि भारत-दक्षिण अफ़्रीका फ़्रेंडशिप एसोसिएशन के चेयरमैन रह चुके और अब भारत के विदेश मामलों के राज्यमंत्री आनंद शर्मा ऐतिहासिक रिश्तों को याद दिलाना नहीं भूलते.

वे कहते हैं, “ पिछले पाँच दशकों में भारत लगातार अफ़्रीका की सामाजिक और आर्थिक प्रगति में उसके साथ रहा है. खाद्य सुरक्षा के मामले से लेकर शिक्षा और हाल ही में औद्योगिक प्रगति में भारत ने अफ़्रीका का साथ दिया है. और पहले जाएँ तो महात्मा गाँधी, जवाहरलाल नेहरू जैसे भारतीय नेताओं ने इस रिश्ते की नींव डाली थी.”

लेकिन जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र संघ में अफ़्रीका के पहले निर्वाचित सदस्य ख़ालिद अब्दुल्ला अब्दुलवहाब कहते हैं कि भारत अमरीका शिखर सम्मेलन को महज़ एक सरकारी कार्यक्रम से आगे बढ़ना होगा.

उनका कहना है, “ ऐसे सम्मेलन बहुत ज़्यादा हासिल नहीं करेंगे जब तक कि लोग एक दूसरे के करीब नहीं आएँगे. मसलन, अफ़्रीका से बड़ी संख्या में छात्रों को पढ़ने भारत आना चाहिए. भारत से कई लोगों को अफ़्रीका के सूडान जैसे देशों में जाना चाहिए. जब तक ये नहीं होता भारत के लोगों के लिए अफ़्रीका वही होगा जो वो नेशनल जियोग्रफ़िक जैसे टीवी चैनलों पर देखते हैं.”

व्यापार जगत से जुड़े लोग भी चाह रहे हैं कि अफ़्रीकी महाद्वीप और भारत करीब आएँ.

भारतीय उद्योग संगठन फ़िक्की का कहना है कि अगर ये संभव हुआ तो वर्ष 2012 तक ही भारत और अफ़्रीका के बीच व्यापार दोगुना होकर 50 अरब डॉलर तक का हो सकता है.

यानि ये एक बहुत बड़ा अवसर है भारत के लिए और अफ़्रीका के लिए.