बुधवार, 09 अप्रैल, 2008 को 11:58 GMT तक के समाचार
परन्जॉय गुहा
आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ
क्या दुनिया का दूसरा सबसे बड़ी जनसंख्या वाला देश भारत खाद्य संकट से जूझ रहा है?
यह सवाल कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन की सरकार और देश के नीति निर्धारकों को परेशान कर रहा है. क़रीब सात फ़ीसदी की महँगाई दर से सरकार की हालत खराब है.
भारत में अब तक खाद्य पदार्थों के बढ़ते दामों के कारण कोई हिंसा नहीं हुई है जैसा कि अर्जेंटीना या ज़िम्बाब्वे जैसे देशों में हुआ.
लेकिन जो बात सबके लिए चिंताजनक है वो यह कि महँगाई बढ़ने की वजह खाद्य पदार्थों के बढ़ते ऊँचे दाम ही हैं.
राजधानी दिल्ली में ही दूध का दाम पिछले साल के मुक़ाबले 11 फ़ीसद ज़्यादा है. इसी बीच खाद्य तेल के दाम तो ख़ासे ज़्यादा यानी क़रीब 40 फ़ीसदी बढ़ गए हैं.
इससे भी ज़्यादा चिंताजनक बात यह है कि चावल के दाम 20 फ़ीसदी और कुछ दालों के दाम 18 प्रतिशत बढ़ गए हैं. दाल और चावल से ही बहुत से भारतीयों का मूल भोजन बनता हैं.
ग़रीबों पर मार
अर्थविशेषज्ञों का कहना है कि महँगाई बढ़ने की सीधी मार ग़रीबों पर इसलिए पड़ेगी क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा भोजन में ही खर्च हो जाता है.
ये सत्ताधारी नेताओं के लिए बुरी ख़बर है क्योंकि उनको जो वोट मिलते हैं उनमें भारत के ग़रीब लोग अमीरों से कहीं बड़ी संख्या में होते हैं.
एक अंदाज़े के मुताबिक, प्रति चार में से एक भारतीय दिन भर में एक डॉलर से भी कम खर्च पर जीता है और हर चार में से तीन भारतीय दो डॉलर या उससे भी कम कमाते हैं.
सरकार का कहना है कि खाद्य पदार्थों के दामों में बढ़ोतरी अंतरराष्ट्रीय कारणों से है लेकिन इस बहस से गरीबों का कुछ भला होने वाला नहीं है.
इस समस्या का संकटपूर्ण पहलू पिछले कुछ सालों से हमारे खेतों में पैदावार बढ़ने की धीमी गति है.
भारतीय अर्थव्यवस्था पिछले पाँच सालों से 8.5 फ़ीसदी औसत की गति से तेज़ी से विकसित हो रही है.
लेकिन यह विकास दर निर्माण उद्योग और बढ़ते सेवा क्षेत्र तक ही सीमित है.
दूसरी ओर पिछले पाँच सालों में कृषि क्षेत्र में मुश्किल से मात्र 2.6 फ़ीसदी विकास हुआ है और पिछले डेढ़ दशक में इसकी विकास दर की प्रवृत्ति देखी जाए तो यह दर गिरी ही है.
परिणामस्वरूप, अनाज (गेहूँ और चावल) की प्रति व्यक्ति पैदावार वर्तमान में भी लगभग उसी स्तर पर है जितनी कि 1970 में हुआ करती थी.
इस समस्या ने गंभीर रुख ले लिया है क्योंकि भारत के 1.1 अरब लोगों के 60 फ़ीसदी की जीविका खेती से ही चलती है. जबकि कृषि उत्पाद देश के वर्तमान सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी का मात्र 18 फ़ीसद हैं.
दूसरी ओर, सेवा क्षेत्र – जिसमें तेज़ी से बढ़ रहा कंप्यूटर सॉफ़्टवेयर और व्यापार आउटसोर्सिंग उद्योग भी शामिल हैं, जीडीपी का 55 फ़ीसद से अधिक बनाता है.
कृषि उत्पादों में कमी को देश में अनाज के भंडारों की स्थिति से समझा जा सकता है.
असुरक्षित किसान
छह साल पहले हमारा अनाज भंडारण रिकॉर्ड स्तर का था.
तब नोबेल पुरस्कार प्राप्त अमर्त्य सेन ने कहा था कि अगर सरकारी संस्था ‘भारतीय खाद्य निगम’ के गेहूँ और चावल के सभी बोरों को एकसाथ रख दिया जाए तो यह ढेर चाँद तक पहुँच जाएगा.
पिछले तीन सालों में कम उत्पादन और निर्यात की वजह से अनाज भंडारों में काफ़ी कमी आई है.
यह समस्या इस तथ्य से और भी बढ़ जाती है कि जब भी पिछले महीनों में भारत ने गेहूँ का आयात किया, गेहूँ के अंतरराष्ट्रीय दाम बढ़ गए.
इस बात को लेकर लोगों में रोष भी है कि सरकार अपने देश के किसानों को उनके उपजाए गेहूँ का जो दाम देती है, उससे दोगुने दामों पर वह विदेश से गेहूँ का आयात करती है.
भारतीय किसान ख़ासतौर पर असुरक्षित हैं क्योंकि देश में कुल कृषि योग्य भूमि के 60 फ़ीसद हिस्से को सिंचाई के लिए पानी नहीं मिलता.
इसके लिए उन्हें चार महीने के मानसून पर भी निर्भर रहना पड़ता है जिस दौरान पूरे साल की 80 फ़ीसदी वर्षा होती है.
कृषि की समस्या किसानों की आत्महत्याओं के बढ़ते मामलों से भी स्पष्ट होती है.
पिछले एक दशक में हर साल ऊँची दर पर स्थानीय सूदखोरों से लिए गए उधार को लौटा पाने में असमर्थ होने पर हर साल कम से कम दस हज़ार किसानों ने आत्महत्याएं की होंगी.
कृषि में घटती राजनीतिक रुचि
इससे पहले भारत में कभी अनाज की इतनी कमी नहीं रही. तब भी नहीं जब 1943 में बंगाल में 15 लाख से भी ज़्यादा लोगों के भूख से मर जाने का अनुमान लगाया गया था.
तब और आज की समस्या एक ही है – उचित मूल्य पर भोजन.
भारत के गरीबों की कम आय को देखते हुए अनाज के मूल्य में छोटी सी बढ़त भी उनकी आय में बड़ी गिरावट पैदा कर देती है.
भारतीय कृषि का वर्तमान संकट बहुत से कारकों की वजह से है जैसे- खेती के उत्पादन में कम विकास, पैदावार का उचित मूल्य न मिलना, अनाज संग्रह और रखरखाव की उचित सुविधाओं की कमी और उसके कारण खराब हुए अनाज से होने वाला नुकसान.
ज़मीन का विभाजन और ग्रामीण क्षेत्रों में ख़ासकर सिंचाई सुविधाओं में निवेश की कमी को भी दोषी ठहराया जा सकता है.
सरकार ने किसानों के 15 अरब डॉलर के ऋण माफ़ कर दिए हैं और पूरे देश में रोज़ग़ार योजना लागू की है जिसमें एक साल में सौ दिन रोज़ग़ार सुनिश्चित करने का वायदा शामिल है.
लेकिन इनमें से कोई योजना तब तक कारग़र नहीं हो सकती जब तक भारत का शासन उपेक्षित खेतों को उतना महत्व देना नहीं शुरू करेंगे जितने
के वे हकदार हैं.