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अल्ताफ़ हुसैन
बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर

सैन्य अधिकारियों के ख़िलाफ़ वारंट

भारतीय कश्मीर में फ़र्ज़ी मुठभेड़ के एक मामले में अदालत ने सैन्य अधिकारियों के ख़िलाफ़ सख़्त रुख़ अपनाया है.

अदालत ने पिछले दिनों एक नागरिक की फ़र्ज़ी मुठभेड़ में हत्या के मामले में सेना के पाँच लोगों के ख़िलाफ़ ग़ैर-ज़मानती वारंट जारी किया है.

इन पाँच सैन्यकर्मियों में से तीन लोग सेना के वरिष्ठ अधिकारी हैं.

हाल ही में भारतीय कश्मीर में लगभग 1000 नामालूम लोगों की कब्र मिली थी जिसके बाद सेना और पुलिस की ओर से अंजाम दी जाने वाली मुठभेड़ों पर फिर से सवाल उठने शुरू हो गए थे.

गुरुवार को श्रीनगर की अदालत ने जिन पाँच लोगों के नाम वारंट जारी किया है उनमें कर्नल विक्रम सिंह, लेफ़्टीनेंन्ट कर्नल वीके शर्मा, मेजर ऋषि खन्ना और सेना के दो जवान शामिल हैं.

इन लोगों के ख़िलाफ़ पुलिस ने मौलवी शौकत अहमद कटारिया की फ़र्ज़ी मुठभेड़ में हत्या करना का मामला दर्ज किया था.

मुठभेड़

मौलवी शौकत को अक्टूबर 2006 में श्रीनगर के आलमगढ़ी बाज़ार से सेना और पुलिस के एक विशेष कार्यदल ने उठा लिया था.

विशेष दस्ते के लोगों और सेना का दावा था कि मौलवी दरअसल पाकिस्तान के कराची शहर का रहनेवाला अबू ज़ाहिद था जिसे मुठभेड़ में मारा गया.

मौलवी के शव को बांदीपुर में दफ़नाया गया था. अब इस शव के डीएनए परीक्षण के बाद यह साफ़ हो गया है कि शव मौलवी कटारिया का है जो कि भारतीय नागरिक थे.

इस फ़र्ज़ी मुठभेड़ के मामले में पुलिस के भी एक एसएसपी समेत चार अधिकारियों के ख़िलाफ़ चार्जशीट दायर हुई थी.

पुलिस अधिकारियों को आरोप साबित होने के बाद जेल भेज दिया गया और वे पिछले एक साल से जेल की सलाखों के पीछे हैं पर सेना के अधिकारी अभी तक अदालत के सामने पेश नहीं हुए हैं.

दागदार वर्दी

इसी तरह के एक अन्य मामले में केंद्रीय जाँच ब्यूरो यानी सीबीआई ने भी सेना के एक ब्रिगेडियर और चार अन्य अधिकारियों के ख़िलाफ़ फ़र्ज़ी मुठभेड़ में पाँच लोगों को मारने का मामला दर्ज किया है.

इन अधिकारियों पर आरोप है कि उन्होंने पाँच कश्मीरी नागरिकों की एक फ़र्ज़ी मुठभेड़ में हत्या कर दी थी.

इस मुठभेड़ के पीछे तर्क दिया गया था कि मारे गए लोग दरअसल घुसपैठिए हैं और दूसरे मुल्क से आए हैं.

हालांकि सेना ने इन अधिकारियों के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की बात यह कहते हुए ख़ारिज कर दी है कि पुलिस को इस संदर्भ में पहले भारत सरकार से अनुमति ले लेनी चाहिए.

राज्य में मानवाधिकारों पर काम कर रहे समूहों ने आशंका जाहिर की है कि पिछले दिनों जो अज्ञात लोगों की 1000 कब्रें पाई गई थीं, उनमें से कई उन लोगों की हो सकती हैं जिन्हें पुलिस या सेना ने उठा लिया था और फिर उनका कोई पता नहीं चला.

पिछले 20 बरसों में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जब लोगों को हिरासत में लिया गया और फिर उनका कोई पता नहीं चला.

मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की माँग है कि इन लोगों के बारे में पता लगाने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय स्तर के आयोग का गठन किया जाए.