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शनिवार, 29 मार्च, 2008 को 07:42 GMT तक के समाचार

सैयद फ़ैसल अली
संपादक, अरब न्यूज़

'ख़बर का असर अच्छा नहीं होगा'

अफ़ग़ानिस्तान में संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के सैनिकों की मौजूदगी की ख़बर को पूरी तरह से गुप्त रखा गया था.

जब तक बीबीसी ने इस ख़बर को प्रकाशित नहीं किया था तब तक तो किसी को मालूम भी नहीं थी. और पता नहीं इस ख़बर का असर है या कोई तकनीकी समस्या है लेकिन इस ख़बर के आने के बाद से जेद्दा में बीबीसी की वेबसाइट भी नहीं खुल पा रही है.

जब लोगों को इस बात का पता चलेगा कि यूएई के सैनिक अफ़ग़ानिस्तान में लड़ रहे हैं तो उसका असर अच्छा नहीं होगा और इसे अच्छी नज़र से नहीं देखा जाएगा.

कहा जा सकता है कि इस्लाम के हित के ख़िलाफ़ है.

लेकिन यूएई के काम करने का अपना अलग ढंग रहा है. वह तेज़ी से बढ़ रही अर्थव्यवस्था है और वह जानता है कि उसकी भूमिका खाड़ी से बाहर भी है.

उसने इससे पहले बोस्निया, लेबनान और सोमालिया में भी अपने सैनिक भेजे हैं.

लेकिन अफ़ग़ानिस्तान में काम करना मुश्किल है क्योंकि वहाँ परिस्थितियाँ दूसरी है.

और जैसा कि साफ़ कर दिया गया है कि उसके सैनिक अफ़ग़ानिस्तान में मानवीय सहायता के लिए काम कर रहे हैं.

हालांकि यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि दुनिया की तीन ही सरकारों ने तालेबान सरकार को मान्यता दी थी और यूएई सरकार उनमें से एक थी.

तालेबान जानते हैं कि यूएई ने उनका समर्थन किया है लेकिन अब अगर वे तालेबान के सामने खड़े हैं तो परिस्थितियाँ बदली हुई हैं.

हालांकि यूएई ने वहाँ मानवीय सहायता के कई अहम काम किए हैं. ख़ोस्त में एक यूनिवर्सिटी खोली है और कई जगह अस्पताल खोले हैं और बहुत सी और चीज़ें भी की हैं.

लेकिन यह बात मान लेना कि यूएई के सैनिक तालेबान जैसे कट्टर लड़ाकों से मुक़ाबला कर रहे हैं आसानी से गले नहीं उतरती. वे इतने समर्थ नहीं हैं.

यूएई लाख कहे कि उसके सैनिक मानवीय कार्यों के लिए अफ़ग़ानिस्तान में हैं, उनका वहाँ होना ही आश्चर्य पैदा करता है और जब यह बात फैलेगी तो यूएई सरकार को इसका ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ सकता है.