बुधवार, 05 मार्च, 2008 को 12:48 GMT तक के समाचार
नंदिता दास
फ़िल्म अभिनेत्री
हर साल महिला दिवस मनाया जाता है, लेकिन मेरे लिए इसके क्या मायने हैं? उम्र के हर पड़ाव में इस सवाल का जवाब मेरे लिए बदलता रहा है.
जब कॉलेज में थी तो लगता था कि महिला दिवस की रैली में जाकर दुनिया बदल जाएगी, एक तरह का आर्दशवाद था. फिर एक समय वो भी आया जब लगने लगा कि इससे कुछ नहीं होने वाला और मायूसी छाने लगी.
अब उम्र के इस मोड़ पर आकर मेरा मानना है कि मायूसी से भरी इस सोच से कतई फ़ायदा होने वाला नहीं है कि समाज में कोई बदलाव नहीं आएगा.
महिला दिवस के बहाने साल में एक दिन ही सही, क़म से क़म महिलाओं से जुड़े मुद्दों पर कुछ रोशनी तो पड़ती है, मीडिया में भी चर्चा होती है. मैं इसी में खु़श हूँ.
महिला दिवस जहाँ एक मौका है महिला शक्ति को सलाम करने का, वहीं रुककर उन महिलाओं के बारे में सोचने का भी मौका है जो बुरी स्थिति में हैं. उन असमानताओं के बारे में सोचा जाए जो आज भी समाज में है और हम उसके लिए क्या कर सकते हैं.
अधिकारों की असमानता
समाज की जो बात मुझे सबसे ज़्यादा परेशान करती है वो है हक़ों की असमानता –महिलाओं और पुरुषों के बीच. और ये ऐसे हक़ हैं जो बहुत सहजता से एक बच्ची को, एक स्त्री को मिल सकते हैं.
कई बच्चियों को जन्म लेने का ही हक़ नहीं है- भारत में कई जगह लिंग अनुपात प्रति हज़ार पुरुष केवल 750 या 800 महिलाएँ हैं. ये त्रासदी से कम नहीं है.
मेरी नज़र में सबसे बड़ा मुद्दा यही है कि वो इज़्ज़त, वो जगह जो किसी भी स्त्री का हक़ है, उसे आज भी नहीं मिल पाया है.
मैं आज बोल पा रही हूँ, आगे बढ़ कर कुछ कर रही हूँ लेकिन मेरी-आपकी तरह हर महिला को ये अधिकार नहीं है.
मानसिकता बदले तो....
समाज में जिस भी तरह की असमानताएँ व्याप्त हैं, महिलाओं के प्रति जो अपराध हो रहे हैं उसका मूल कारण हमारी मानसिकता है.
कहने को क़ायदे-क़ानून समाज में ज़रूर हैं. लेकिन जब तक लोगों की ये मानसिकता नहीं बदलेगी कि महिलाओं के ख़िलाफ़ आप अपराध कर सकते हैं और फिर बच के निकल सकते हैं, कुछ भी बदलना बहुत मुश्किल है.
अगर किसी लड़की का बलात्कार होता है तो वो और उसके घर वाले शर्मिंदा होते हैं जबकि शर्मिंदा उसे होना चाहिए जिसने ये अपराध किया है.
दुर्भाग्यवश ये मानसिकता बहुत-बहुत धीरे-धीरे बदल रही है. इसके लिए कोई दवा तो है नहीं कि आप खा लें और मानसिकता बदल जाए.
इस मानसिकता को बदलने के लिए हर एक माध्यम की ज़रूरत है- क़ानून, राजनीतिक इच्छाशक्ति, घर का माहौल,मीडिया, फ़िल्म... जब हर स्तर पर मानसिकता बदलेगी, तब जाकर समाज में कुछ इसका असर दिखाई देगा.
अक़सर संसद में महिलाओं के लिए आरक्षण की बात उठती है. पंचायतों में महिलाओं को आरक्षण हासिल है. शायद ऐसे कई मौके आएँगे जब कोई पति या भाई घर की महिला को रबर स्टैंप की तरह आगे कर देगा और उसके ज़रिए अपने मन के फ़ैसले करवाएगा.
लेकिन मुझे यकीन है कि ऐसे कई किस्सों के बाद कुछ महिलाएँ ऐसी भी आगे आएँगी जो कहेंगी कि वे रबर स्टैंप बनने के लिए तैयार नहीं है.
इसलिए मेरी नज़र में संसद या पंचायत में महिलाओं के लिए आरक्षण ज़रूरी है ताकि उनका नज़रिया दुनिया के सामने आ सके.
दुनिया की आधी-आबादी महिलाओं की है, तो अगर आधा नहीं तो कम से कम 33 फ़ीसदी हक़ माँगने में तो कोई बुराई नहीं है.
(बीबीसी संवाददाता वंदना से बातचीत पर आधारित)
( महिला दिवस पर बीबीसी की ये प्रस्तुति आपको कैसी लगी,आप अपनी राय हमें hindi.letters@bbc.co.uk पर भेज सकते हैं)