बुधवार, 05 मार्च, 2008 को 11:50 GMT तक के समाचार
असित जॉली
वाघा से
पाकिस्तान की जेल में 35 वर्ष गुज़ार कर लौटे कश्मीर सिंह की कहानी एक भावुक प्रेमकथा भी है.
उनकी पत्नी परमजीत ने कभी उनकी वापसी की उम्मीद नहीं छोड़ी, उन्हें पक्का विश्वास था कि वे अपने जीवनसाथी और तीन बच्चों के पिता से ज़रूर मिल सकेंगी.
जब कश्मीर सिंह का परिवार इतने लंबे विछोह के बाद एक दूसरे से मिला तो पाँचों लोग इस तरह गले मिले कि अलग होने को तैयार नहीं थे.
उनकी जादू की झप्पी भारत के परंपरागत सामाजिक तौर-तरीक़ों के हिसाब से काफ़ी लंबी थी.
67 साल के कश्मीर सिंह धारीदार कमीज़ और पैंट में सैकड़ों लोगों की जोश भरी भावुक भीड़ के सामने आए, उन्होंने बहुत उत्साह के साथ हाथ हिलाकर लोगों का अभिवादन किया.
पैंतीस वर्षों तक खामोशी से अपने पति की वापसी का विश्वास लिए इंतज़ार करती रही परमजीत वाघा सीमा पर काफ़ी पहले से पहुँच गई थीं.
सीमा पर मौजूद एक अधिकारी ने पति-पत्नी की मुलाक़ात के बारे में कहा, "ये एक बहुत ही भावुक लम्हा था, वे एक साथ हँस भी रहे थे और रो भी रहे थे."
कश्मीर सिंह ने अपनी पत्नी को बहुत प्यार और अदब से बेगम कहकर बुलाया, और कहा कि वे जब उनसे बिछड़े थे तब वे जवान और सुंदर थीं.
फिर उन्होंने चुटकी ली, "सुंदर तो आप अब भी हैं, बस थोड़ी उम्र ढल गई है."
उन्होंने हँसते हुए कहा कि बच्चों के बारे में ज्यादा याद नहीं है लेकिन पत्नी की ढेर सारी यादें हैं.
कश्मीर कहते हैं कि उनकी पत्नी की ही यादें हैं जिनकी वजह से वे जेल में क़ैद-ए-तन्हाई की तकलीफ़ को झेल सके.
कश्मीर सिंह को 1973 में जासूसी के आरोप में मौत की सज़ा सुनाई गई थी और उनकी माफ़ी की अपील लंबित पड़ी थी.
वाघा सीमा पर मुलाक़ात के बाद कश्मीर सिंह और परमजीत होशियारपुर ज़िले के अपने गाँव नंगल चौरां चले गए हैं जहाँ पूरा गाँव उनके जश्न में शामिल है.