बुधवार, 27 फ़रवरी, 2008 को 09:50 GMT तक के समाचार
रेणु अगाल
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
पहली बार भारत के व्यापार जगत में देश की लगभग आधी आबादी यानी महिलाओं की हिस्सेदारी चर्चा का विषय बनी है. दिल्ली में संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास संस्था के तीन दिन के सम्मेलन में इसी विषय पर ख़ासी चर्चा हुई है.
भारत के सरकारी आंकड़ों के मुताबिक देश की कुल जनसंख्या में 48 फ़ीसदी महिलाएँ हैं.
इनमें से 96 प्रतिशत महिलाएँ असंगठित क्षेत्र में काम करती हैं. जबकि, 21 प्रतिशत महिलाएं नौकरियाँ करती हैं. लेकिन अपना ख़ुद का कारोबार करने का कदम कुछ ही महिलाएँ उठा पाती हैं.
भारत की सामाजिक न्याय और सशक्तिकरण मंत्री मीरा कुमार का कहना है, "हर देश में व्यापार नीति और लिंग भेदभाव के व्यापार पर हो रहे असर को देखने के लिए शोध होना चाहिए. ऐसे उपाय सोचे जाने चाहिए कि जिन उद्योगों में ज़्यादा महिलाएँ काम करती हैं, उन्हें रियायत दी जाए."
संयुक्त राष्ट्र की चिंता
संयुक्त राष्ट्र हो या फिर उसके तय किए गए सहस्राबदि विकास लक्ष्य, सभी में लिंग भेद को दूर करने का ध्येय तय है.
भारत सरकार भी महिलाओं और पुरुषों के समान अधिकारों की बात कहती है. इस बात को लेकर भी चिंता बनी हुई है कि नीति निर्माण में महिलाओं की भागीदारी और उनके अधिकारों को कैसे बनाए रखा जा सकता है.
खासकर भारत जैसे विकासशील देशों में जहां महिलाएं समाज में सबसे ग़रीब तबके में आती हैं.
सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास संस्था के महासचिव डॉक्टर सुपाचाई पनिचपाक्ड़ी ये तो मानते हैं कि व्यापार में बढ़ोतरी में महिलाओं की महत्वपूर्ण भागीदारी है.
लेकिन वे इस बात को लेकर चिंतित हैं कि व्यापार में महिलाओं की स्थिति पर ज़्यादा आंकड़े नहीं हैं चाहे निर्यात करने वाले उद्योगों में महिलाओं को नौकरियां और वेतन दोनों ज़्यादा मिलता है.
जिन महिलाओं की आर्थिक हालत सुधरती है समाज में उनकी पूछ बढ़ती है. जिससे महिला सशक्तिकरण में मदद मिलती है. आंकड़े ये भी दिखाते हैं कि महिलाएं अपनी कमाई का पुरुषों के मुकाबले ज़्यादा हिस्सा बच्चों पर खर्च करती हैं.
एक तथ्य ये भी सामने आया है कि व्यापार ने जहाँ महिलाओं की स्थिति सुधारी है तो बिगाड़ी भी है - जैसे भारत के चाय बाग़ानों में पाया गया है.
महिलाओं को पुरुषों के मुक़ाबले 30 प्रतिशत कम वेतन भी मिलता है.
क्या है आंकड़े ?
अब संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास संस्थान अगले साल घाना में अपनी वार्षिक बैठक करने जा रहा है. इसमें भी महिलाओं की व्यापार में हिस्सेदारी पर चर्चा करेगा. अगले साल होने वाली इस बैठक में आए सुझावों को व्यापार नीति का हिस्सा बनाने की कोशिश की जाएगी.
संयुक्त राष्ट्र व्यापार और विकास संस्थान के महासचिव सुपाचाई पनिचपाक्ड़ी का कहना है, "चीज़ें धीरे-धीरे होंगी, बदलाव आएंगे. इस तरह की होने वाली बैठकों से ही सरकारें जागरूक होती हैं. ये कोशिशें विश्व स्तर पर जारी हैं. ये लंबी लड़ाई है और दक्षिण एशिया के देशों में हमें नीति निर्धारकों को ज़्यादा समझना पड़ेगा."
फ़िल्म अभिनत्री नंदिता दास का मानना है कि आवाज़ उठाना ज़रूरी है क्योंकि व्यापार नीति के संदर्भ में उठाया गया हर छोटा कदम भी महिला सशक्तिकरण के लिए उपलब्धी होगा.
वे कहती हैं, "इन विषयों पर हम जितना बोलें उतना अच्छा है. अब महिलाएँ आवाज़ उठाने लगी हैं. जब हर स्तर पर प्रयास होगा तो असर भी होगा. ये नही सोचना चहिए कि ये राजनीतिक नेताओं या अभिनेताओं का काम है."