सोमवार, 25 फ़रवरी, 2008 को 14:21 GMT तक के समाचार
उत्तर प्रदेश के देवबंद शहर में आयोजित देश के सर्वोच्च इस्लामिक सम्मेलन में 'आतंकवाद' की सभी कार्रवाई को ग़ैर इस्लामी कहा गया है.
दारुल-उलूम के आतंकवाद विरोधी सम्मेलन में सभी तरह की हिंसा और आतंकवाद की आलोचना करते हुए एक घोषणापत्र को पारित किया गया. इस सम्मेलन में सैकड़ों मुस्लिम विद्वानों, धार्मिक नेताओं और मौलवियों ने हिस्सा लिया.
घोषणापत्र में कहा गया है- 'इस्लाम ऐसा धर्म है, जिसमें सभी के प्रति दया-दृष्टि रखी जाती है. इस्लाम सभी तरह की हिंसा, आतंकवाद और अत्याचार की कड़ी आलोचना करता है. इस्लाम में अत्याचार, धोखा, दंगा और हत्या को सबसे बड़ा पाप माना गया है.'
घोषणापत्र में मुस्लिम विद्वानों से अपील की गई है कि वे इस्लाम विरोधी और राष्ट्र विरोधी शक्तियों के प्रभाव में न आएँ. दारुल-उलूम के प्रमुख प्रशासक मौलाना मरग़ूब-उर-रहमान ने कहा कि हमारा आतंकवाद और आतंकवादियों से कोई लेना-देना नहीं है.
शिक्षा
उन्होंने कहा कि इस्लाम प्यार और शांति का धर्म है और इसकी शिक्षाओं में आतंकवाद की कोई जगह नहीं है. क़ुरान की आयतों का हवाला देते हुए मरग़ूब-उर-रहमान ने कहा, "इस्लाम सभी लोगों के बीच समानता और करुणा की शिक्षा देता है."
घोषणापत्र में सरकार पर आरोप लगाया गया है कि वह आतंकवाद के मामलों की जाँच करते समय मदरसों के प्रति 'निष्पक्ष' नहीं रहती.
मौलाना रहमान ने कहा, "देश के हर हिस्से में फैले मदरसे मानवता, शांति, सहनशीलता और प्यार की शिक्षा देते हैं." उन्होंने मदरसों के कर्ता-धर्ता से अपील की कि वे वित्तीय मामलों में और पारदर्शिता बरतें और अपने यहाँ शुद्ध इस्लामी माहौल स्थापित करें.
दारुल-उलूम के जनसंपर्क अधिकारी आदिल सिद्दीक़ी ने कहा कि जब भी आतंकवाद की घटनाएँ होती हैं, इसे मुसलमानों से जोड़ने की हरसंभव कोशिश की जाती है. ख़ासकर मदरसों को निशाना बनाया जाता है, जो बिल्कुल ग़लत है.
भारत में क़रीब छह हज़ार मदरसों के प्रतिनिधियों ने इस सम्मेलन में हिस्सा लिया. 1866 में स्थापित दारुल-उलूम भारत का सबसे पुराना और दुनिया के सबसे बड़े मदरसों में से एक है.