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मंगलवार, 19 फ़रवरी, 2008 को 15:25 GMT तक के समाचार

मोहम्मद इलियास ख़ान
बीबीसी संवाददाता, कराची

परिणामों में दिखा मुशर्रफ़ का विरोध

पाकिस्तान के चुनावों के आए परिणामों से राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के सारे अरमानों पर पानी पड़ गया.

मुशर्रफ़ की राजनीतिक साथी ‘पाकिस्तान मुस्लिम लीग- क़ायदे आज़म’ (पीएमएल-क्यू) काफ़ी पीछे रह गई.

राष्ट्रपति अपनी उम्मीदों के विपरीत पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की पीएमएल-एन पार्टी को मिली बढ़त से भी परेशान होंगे. नवाज़ शरीफ़ को परवेज़ मुशर्रफ़ ने 1999 में शासन से हटा दिया था.

चुनाव नतीजों के अनुसार पीएमएल-एन और पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी (पीपीपी) बढ़त पर हैं.

बुरी ख़बर

पीएमएल-क्यू ने इन दोनों पार्टियों से पीछे रहते हुए बहुत बुरा प्रदर्शन किया है.

पीएमएल-एन और पीपीपी इन चुनावों के मद्देनज़र एक दूसरे से बात कर चुके हैं और संभवतया मिल कर एक साझा सरकार बना सकते हैं.

हालांकि यह मुशर्रफ़ के लिए अच्छा नहीं होगा.

पीएमएल-एन पिछले नवंबर में देश के न्यायाधीशों को बर्खास्त करने और आपातकाल लगाने के मुशर्रफ़ के निर्णय के विरोध में अपने एजेंडे के माध्यम से आवाज़ उठाती रही है.

हो सकता है कि इस साझा सरकार को इतना संसदीय समर्थन मिल जाए कि वह मुशर्रफ़ को घेर सके या सरकार को बर्खास्त करने की उनकी शक्ति छीन सके.

इसलिए मुशर्रफ़ की भरपूर कोशिश यही होगी कि इन दोनों पार्टियों को मिलकर भविष्य की सरकार बनाने से रोकें.

साझा सरकार?

अगर मौका मिला तो वे पीएमएल-एन नहीं बल्कि पीपीपी के साथ मिलकर ख़ुद सरकार बनाना चाहेंगे जो उनकी नीतियों के प्रति कुछ कम आलोचक है.

मुशर्रफ़ की दूसरे साथी दल मुत्तहिदा क़ौमी मूवमेंट (एमक्यूएम) का देश के सबसे बड़े शहर कराची से सफ़ाया हो चुका है.

विश्लेषकों का मानना है कि चुनाव परिणाम मुशर्रफ़ की नीतियों के विरोध में लोगों का एकमत है.

चुनाव में केवल पीएमएल-क्यू का ही नहीं बल्कि धार्मिक संगठन एमएमए का भी उसके ही गढ़ से लगभग सफ़ाया हो चुका है.

पीपीपी का वजूद बढ़ा

पीपीपी ने दक्षिण-पश्चिम बलूचिस्तान प्रांत में अपनी उचित उपस्थिति दर्ज कराई है.

सिंध में पीपीपी ग्रामीण क्षेत्रों में भी घुस गई है और प्रांत के 60 फ़ीसद मत उसके पक्ष में गए हैं.

पंजाब में भी पीपीपी ने शक्तिशाली दल के रूप में पहचान बनाई है.

कुछ इक्का-दुक्का घटनाओं को छोड़ दें तो सिंध में ज़्यादातर लोगों का मानना यह है कि चुनाव पूरी तरह निष्पक्ष हुए हैं.

उनका कहना है कि यह केवल इसलिए संभव हुआ क्योंकि इस चुनाव पर अंतरराष्ट्रीय समुदाय, स्थानीय मीडिया की निगाहें लगी हुई थीं जिससे सरकार को बदनामी का डर था.

इसका परिणाम यह हुआ कि मुशर्रफ़ और उनकी की ग़लत नीतियों के विरोध में खुलकर मत पड़े.