सुबीर भौमिक
बीबीसी संवाददाता, कोलकाता
अधिकारियों का कहना है कि गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट से अलग हुए राजनीतिक दल एक बार फिर अलग राज्य की माँग को लेकर सड़कों पर उतर आए हैं.
गोरखा लिबरेशन फ्रंट से गोरखा जनमुक्ति मोर्चा अलग हो गया था.
इस क्षेत्र को स्वायत्तता संबंधी केंद्र सरकार और पश्चिम बंगाल के पैकेज का गोरखा जनमुक्ति मोर्चा ने शुरू से ही विरोध किया था और अब वे फिर खुलकर सामने आ गए हैं.
मोर्चे के प्रमुख विमल गुरंग कहते हैं, " हम दार्जिलिंग को भारत के संविधान के छठी अनुसूची में रखने के प्रस्ताव का विरोध करते हैं. हम गोरखा लोगों के लिए अलग राज्य चाहते हैं."
जीएनएलएफ़ के प्रमुख सुभाष घीसिंग 1988 से दार्जिलिंग गोरखा हिल कॉउंसिल के अध्यक्ष हैं जबकि गुरंग किसी समय घीसिंग के विश्वासपात्र थे लेकिन अब वे उनसे अलग हो गए हैं.
रास्ते अवरुद्ध
सोमवार को जब घीसिंग केंद्र सरकार के साथ स्वायत्तता पैकेज की बात तय करके दिल्ली से लौटे तो गुरांग के सैकड़ों समर्थकों ने बागडोगरा हवाईअड्डे से दार्जिलिंग तक के रास्तों को जगह जगह अवरुद्ध कर दिया.
घीसिंग ने उस वक्त तो विवाद को टालते हुए कहा कि वे दार्जिलिंग से 70 किलोमीटर दूर पिनटेल में कुछ दिन आराम करेंगे.
हालांकि उन्होंने इस बात से इनकार किया कि ऐसा उन्होंने पुलिस की हिदायत की वजह से किया है.
विमल गुरंग ने मंगलवार को कहा," यदि योजना रद्द नहीं की गई और घीसिंग ने दार्जिलिंग हिल कॉउंसिल के अध्यक्ष पद से इस्तीफ़ा नहीं दिया तो वे बुधवार से अनिश्चितकालीन हड़ताल की घोषणा कर देंगे."
उधर घीसिंग का कहना है कि दार्जिलिंग का भविष्य भारतीय संविधान की छठीं अनुसूची में ही सुरक्षित है क्योंकि ये पूर्ण स्वायत्तता देता है.
उन्होंने कहा, " यह प्रावधान भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में कारगर रहा है और ये दार्जिलिंग के लोगों की उम्मीदों पर खरा उतरेगा."
घीसिंग ख़ुद भी 1988 में पृथक राज्य के लिए हुए हिंसक आंदोलन का नेतृत्व कर चुके हैं.