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रविवार, 17 फ़रवरी, 2008 को 14:19 GMT तक के समाचार

ज़ुल्फ़िक़ार अली
बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद

नहीं भूल पाए लाल मस्जिद ऑपरेशन...

लाल मस्जिद फ़ौजी ऑपरेशन को हुए लगभग सात महीने बीत चुके हैं, लेकिन उसका प्रेत पाकिस्तान के राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ के समर्थन वाली पार्टी मुस्लिम लीग (क्यू) का अब भी पीछा नहीं छोड़ रहा है.

उनके उम्मीदवारों को चुनाव प्रचार के दौरान इस विषय में वोटरों के सवालों का सामना करना पड़ा.

वैसे तो पाकिस्तान में लोगों की सामूहिक-याद काफ़ी कमज़ोर है, लेकिन बहुत से लोगों के मन में लाल मस्जिद ऑपरेशन का जख़्म अभी भी ताज़ा है.

प्रत्याशियों से सवाल

चुनाव प्रचार के दौरान मुस्लिम लीग (क्यू) के उम्मीदवारों से वोटरों ने लाल मस्जिद ऑपरेशन के दौरान सौ से अधिक छात्र-छात्राओं की मौत के बारे में सवालों का सामना करना पड़ा.

रावलपिंडी के एक वोटर ने मुस्लिम लीग (क्यू) के उम्मीदवार पूर्व रेल मंत्री शेख़ रशीद के ख़िलाफ़ अपना ग़ुस्सा दिखाते हुए कहा कि शेख़ रशीद को उस वक़्त अपने मंत्री पद से इस्तीफ़ा दे देना चाहिए था, जब लाल मस्जिद ऑपरेशन में मासूम बच्चों और बच्चियों की मौत हुई थी.

उन्होंने कहा कि अगर उन्होंने इस्तीफ़ा दे दिया होता तो वह लोगों से वोट मांगने का हक़ भी रखते थे. लोग उनके साथ चलते भी, लेकिन अब हम उनका समर्थन नहीं करेंगे और न ही उनको वोट देंगे.

पूर्व मंत्री शेख़ रशीद मानते हैं कि लोग उनकी सरकार की ओर से अमरीकी नितीयों के समर्थन के विरुद्ध हैं. उनका कहना है कि वह इसके बावजूद चुनाव जीत जाएंगे.

इमाम से मुलाक़ात

चुनाव बिल्कुल पास आने पर मुस्लिम लीग (क्यू) के नेता चौधरी शुजात हुसैन ने इडयाला जेल में बंद लाल मस्जिद के पुर्व ख़तीब (जुमे को मस्जिद भाषण देने वाले इमाम) मौलाना अब्दुल अज़ीज़ से कुछ दिन पहले ही अचानक मुलाक़ात की.

लाल मस्जिद के प्रवक्ता आमिर सिद्दीक़ ने कहा कि चौधरी शुजात हुसैन की मुलाक़ात का मक़सद मौलाना की ख़ैरीयत पूछना था. उन्होंने कहा कि चौधरी शुजात ने इस मुलाक़ात के दौरान मौलाना से कहा, “अगर वह सत्ता में आए तो वह उनकी रिहाई के लिए कोशिश करेंगे.”

उन्होंने कहा कि चौधरी शुजात हुसैन ने ऐसे वक़्त में मुलाक़ात की जब चुनाव हो रहे हैं तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि वह उनकी अपनी साख बहाल करने की राजनीतिक कोशिश हो.

क़ायम है उम्मीद

आमिर सिद्दीक़ का कहना है कि हम दुआ करते हैं कि यह उनकी संजीदा कोशिश हो और वह उसे अपने राजनीतिक उद्देश्य के लिए इस्तेमाल नहीं करेंगे. उन्होंने कहा कि लाल मस्जिद की घटना के वक़्त जब वह सत्ता में थे तो भी उन्होंने अपना रोल नहीं निभाया, अब कम से कम उनको मौलाना की रिहाई और दूसरे मामलों को हल करने के लिए संजीदा कोशिश करनी चाहिए.

पिछले कुछ दिनों से पाकिस्तान को लाल मस्जिद ऑपरेशन के साथ-साथ न्यायपालिका की समस्या और मंहगाई की समस्या का सामना करना पड़ रहा है. अब ऐसा दिखाई दे रहा है कि उन समस्याओं का चुनावी मलबा सत्ताधारी पार्टी पर गिर रहा है.