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रविवार, 17 फ़रवरी, 2008 को 16:22 GMT तक के समाचार

अल्ताफ़ हुसैन
बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर

पाक में स्थिरता चाहते हैं कश्मीरी अलगाववादी

भारत हो, पाकिस्तान हो या फिर दोनों के बीच विवाद का विषय रहा कश्मीर, हर कोई इस बात को लेकर फ़िक्रमंद है कि पाकिस्तान में किसकी सरकार बनेगी. क्या इन चुनावों के बाद परवेज़ मुशर्रफ़ को राष्ट्रपति की कुर्सी छोड़नी पड़ेगी?

इसपर सभी अपनी-अपनी राय भी दे रहे हैं लेकिन भारत प्रशासित कश्मीर में अलगाववादियों की कमान संभालने वाले नेता इस बात को लेकर दुखी हैं कि कोई उनसे नहीं पूछता कि वो क्या चाहते हैं.

पाकिस्तान में चुनाव के मुद्दे पर थोड़ी-सी बात करने से ही उनका दर्द छलककर बाहर आ जाता है.

आम शहरियों की तरह ही भारत प्रशासित कश्मीर के अलगाववादी नेता भी चाहते हैं कि सोमवार के चुनावों के बाद पाकिस्तान में एक मज़बूत और स्थायी सरकार बने.

अलगाववादियों की चाह

अलगाववादियों के नरम और गरम, दोनों ही धड़ों के नेता चाहते हैं कि पाकिस्तान में ऐसी सरकार बने जो बम धमाकों और गोलियों की आवाज़ से दहल रहे पाकिस्तान में स्थायित्व ला सके.

हाल ही में दोबारा 'हुर्रियत कॉन्फ्रेंस' में शामिल होने वाले अलगाववादी नेता शब्बीर शाह भी पाकिस्तान की मौजूदा हालात पर चिंतित हैं.

शब्बीर कहते हैं, "सरकार में कोई भी आए, हम सिर्फ़ ये चाहते हैं कि वहां एक मज़बूत सरकार बने जो पाकिस्तान में स्थायित्व ला सके."

शाह मानते हैं, "सरहद पार किसी भी पार्टी की जीत या हार से पाकिस्तान की कश्मीर नीति पर कोई फ़र्क पड़ने वाला नहीं है. कश्मीर के मसले पर वहां सभी पार्टियां एकमत हैं."

शब्बीर शाह कहते हैं, "पाकिस्तान में कोई भी सरकार बनाए, हम तो बस ये चाहते हैं कि वो हमारी आज़ादी की लड़ाई के लिए राजनीतिक, कूटनीतिज्ञ और नैतिक मदद देते रहें."

शाह मानते हैं, "सैनिक शासन के दौरान परवेज़ मुशर्रफ़ ने भी कश्मीर का मसला अंतरराष्ट्रीय मंच पर उतनी मज़बूती से नहीं रखा था, जैसा उसे रखा जाना चाहिए था.'

वहीं, कश्मीर के एक और अलगाववादी नेता सैयद अली शाह गीलानी, परवेज़ मुशर्रफ़ की कश्मीर नीति पर अलग ही नज़रिया रखते हैं.

गीलानी उन पार्टियों के रवैये से दुखी हैं जिन्होंने पाकिस्तान में चुनावों का बहिष्कार किया है. उनका मानना है, "कश्मीर के मामले में मुशर्रफ़ सरकार ने अपनी नीतियां पूरी तरह उलट ली हैं."

गीलानी कहते हैं, "सत्ता में चाहे जो भी आए, हम चाहते हैं कि वो कश्मीर के लोगों के संकल्प को मज़बूती दे. अगर अगली सरकार इसमें नाकाम भी रहती है तो भी आज़ादी के लिए हमारा संकल्प जारी रहेगा."

शब्बीर शाह की तरह ही गीलानी भी चाहते हैं कि पाकिस्तान में चुनाव बिना किसी हिंसा के हो जाएं. गीलानी मानते हैं कि चुनाव निष्पक्ष होने पर पाकिस्तान में तानाशाही ख़त्म हो जाएगी. जो पाकिस्तान के सबसे बेहतर होगा.

आम आदमी की सोच

पाकिस्तान के चुनावों को कश्मीर का आम आदमी भी टकटकी लगाए देख रहा है.

श्रीनगर में किराने की एक दुकान चलाने वाले माजिद कहते हैं कि पाकिस्तान में हिंसा परवेज़ मुशर्रफ़ द्वारा लाल मस्जिद पर हुई कार्रवाई के बाद ही शुरू हुई है.

लेकिन, माजिद मानते हैं कि बेनज़ीर भुट्टो की पीपीपी को नहीं जीतना चाहिए क्योंकि भुट्टो की पार्टी की नीतियां भी मुशर्रफ की ही तरह अमरीका समर्थक नीतियां हैं.

माजिद की तरह ही कुछ और लोग भी सोचते हैं कि पाकिस्तान में सरकार के बदलने पर ही शांति और स्थायित्व आएगा.

लेकिन, यहीं के सैयद मक़बूल अंदराबी चाहते हैं कि पाकिस्तान में मुशर्रफ समर्थित सरकार आए क्योंकि मुशर्रफ ने कश्मीर मसले को हल करने के लिए कई निर्भीक क़दम उठाए हैं. अंदराबी मानते हैं कि मुशर्रफ़ इस मसले को हल कर सकते हैं.

ख़्यालात और नज़रिए चाहे जो भी हों लेकिन कश्मीर के लोग चाहते हैं कि पाकिस्तान में शांति और स्थायित्व कायम हो.