गुरुवार, 14 फ़रवरी, 2008 को 13:03 GMT तक के समाचार
राजेश जोशी
बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद से
इस्लामाबाद हवाई अड्डे पर पासपोर्ट की जाँच करने वाली उस लड़की ने कहा मैं पहाड़ों की रहने वाली हूँ.
मैंने पाकिस्तान के मशहूर हिलस्टेशन मरी का नाम सुन रखा था, इसलिए तुरंत कहा – क्या आप मरी की रहने वाली हैं. लड़की ने मेरी ओर देखा और कहा – आपको इंसानों की बिल्कुल ठीक पहचान है, जी हाँ मेरा घर मरी में ही है.
मैंने कहा कि मैं भी पहाड़ का ही हूँ – हिंदुस्तान में... नैनीताल का. लड़की ने कहा – अरे बाज़ फ़िल्म में तो नैनीताल की ही शूटिंग होती है. मैं तो आपके शहर को जानती हूँ.
अगर हिंदी फ़िल्में न होतीं तो भारत-पाक रिश्ते कितने और जटिल हो गए होते?
ये पाकिस्तान की धरती पर किसी पाकिस्तानी से मेरा पहला सीधा संवाद था. दूसरा संवाद भी इत्तेफ़ाक से एक लड़की से ही हुआ जो ब्रिटिश एअरवेज़ की कर्मचारी थी.
अपनी गुम हुई अटैची तलाशता मैं मदद के लिए उसके पास पहुँचा. हाथ में वॉकी टॉकी लिए, सुंदर सी उस लड़की की नेम प्लेट मैंने पढ़ी और बेसाख़्ता बोल उठा – कविता हरमन, आपका नाम तो बिल्कुल हिंदुओं जैसा लगता है.
लड़की हँसी और मेरे सवाल का आख़िरी हिस्सा दोहरा दिया – नाम, हिंदुओं जैसा लगता है. तभी उसका वायरलैस सैट खड़खड़ाया. लड़की ने मेरी जिज्ञासा को पूरी तरह अनदेखा करते हुए वायरलैस पर जवाब दिया- “अस्सलाम अलैकुम,...”
बात ख़त्म करने के बाद वो फिर मेरी ओर मुड़ी और हँसते हुए कहा – नाम ही हिंदुओं वाला नहीं, मैं भी हिंदू हूँ.
दोनों लड़कियों ने ये क्या किया? उन्होंने मुझ जैसे एक आम भारतीय के दिमाग़ में बनी पाकिस्तान की तस्वीर को बिल्कुल पलट कर रख दिया.
लेकिन पाकिस्तान की तस्वीर का ये सिर्फ़ एक पहलू था. आप कह सकते हैं कि तस्वीर का ये सिर्फ़ रोमांटिक पहलू था. दूसरा पहलू इस रोमांटिक यथार्थ से झंझोड़ कर जगाने वाला था.
पाकिस्तान की प्रसिद्ध डेवू बस लेकर मैं इस्लामाबाद से लाहौर के लिए रवाना हुआ.
आलीशान मोटर वे और वर्ल्ड क्लास बस सर्विस शुरू करने का श्रेय पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ को जाता है और इस चुनावी माहौल में नवाज़ शरीफ़ की पार्टी अख़बारों में विज्ञापन देकर मतदाताओं के सामने इसे अपनी उपलब्धियों के तौर पर गिनवाना नहीं भूली है.
इससे पहले कि ड्राइवर बस स्टार्ट करता, एक लंबा तगड़ा आदमी – शायद पुलिस वाला होगा -- हाथ में वीडियो कैमरा लेकर बस में घुसा और आगे से लेकर पीछे तक बैठे सभी यात्रियों की फ़िल्म उतारने लगा.
इससे पहले कि मैं कुछ कहता मुझे दो चीज़ें याद आईं – पहली ये कि कुछ ही समय पहले बेनज़ीर भुट्टो की हत्या कड़ी सुरक्षा के बावजूद कर दी गई थी. इसलिए सुरक्षा के इंतज़ाम तो होंगे ही.
और दूसरी ये कि मैं पाकिस्तान में भारतीय पासपोर्ट पर सफ़र कर रहा था.