मंगलवार, 12 फ़रवरी, 2008 को 12:26 GMT तक के समाचार
इर्शादुल हक़
मुज़फ़्फ़रपुर से
बिहार के मुज़फ्फरपुर शहर के ढेर सारे लोग पिछले तीन दशकों से हर सुबह एक ऐसे अखबार बेचने वाले की आवाज़ से जागते हैं जो एक पूर्व मंत्री के बेटे हैं.
सत्तावन वर्षीय अखबार विक्रेता उदय प्रकाश गुप्ता दिवंगत मोहन लाल गुप्ता के पुत्र हैं जो 1969 में बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर के मंत्रिमंडल में खाद्य एवं आपूर्ति मंत्री हुआ करते थे.
उदय प्रकाश कहते हैं, "आज जब कोई यह कहता है कि अमुक आदमी एक मंत्री है तो सहज ही लोग अनुमान लगाते हैं कि उसके पास गाड़ी, बंगला और दौलत की कोई कमी नहीं होगी. पर हमारी सबसे बड़ी दौलत यही है कि मैं मोहन लाल गुप्ता का बेटा हूँ".
वे कहते हैं, "हमें इस बात पर कोई अफ़सोस नहीं कि मैं लोगों के दरवाज़े-दरवाज़े अखबार पहुँचाता हूँ, बल्कि मेरे लिए यह स्वाभिमान की बात है कि मैं पिताजी की ईमानदार छवि को बनाए रखने में कामयाब हूँ".
महात्मा गांधी और विनोबा भावे के अनुयायी मोहन लाल गुप्ता की ईमानदारी और स्वाभिमान के बुज़ुर्गों से सुने क़िस्से, आज भी मुज़फ्फरपुर के लोग याद करते हैं.
मोहन लाल ने अपने बेटे को नौकरी दिलवाने के लिए अधिकारियों को फोन करने से यह कहते हुए मना कर दिया था कि इससे उनके स्वाभिमान और ईमानदारी पर बट्टा लगता है और यह गांधीवादी परंपरा के खिलाफ़ होगा.
उदय प्रकाश ने 1968 में मैट्रिक की परीक्षा पास करने के बाद तकनीकी शिक्षा का दो वर्ष का पाठ्यक्रम पूरा किया था. उस ज़माने में ये योग्यता नौकरी के लिए ठीक मानी जाती थी.
विरासत
उदय प्रकाश के पास पिता की विरासत के रूप में शहर के नया टोला मुहल्ले में एक मकान है जिसकी यादें जवाहर लाल नेहरू से जुड़ी हैं. इस मकान में नेहरू जी 1934 के भयानक भूकंप के बाद आकर ठहरे थे और लोगों में यहीं से राहत सामग्री बाँटी थी.
बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र उन नेताओं में से हैं जो न सिर्फ मोहन लाल गुप्ता के क़रीब थे बल्कि उनके साथ काफ़ी समय भी बिताया था. डॉ. मिश्र तो यह सुन कर भौंचक रह जाते हैं कि उदय अखबार बेचते हैं.
वे कहते हैं, "मोहन लाल जी की ईमानदारी पर क़समें खाई जा सकती हैं. वह महात्मा गांधी और विनाबा भावे के सिद्धांतों के सच्चे सिपाही थे. हम दोनों ने काफी दिनों तक कांग्रेस में साथ-साथ काम किया था. वह बाद में कांग्रेस से अलग हो गये थे. जब मैं मुख्यमंत्री था तो वह कभी-कभी मुझसे मिलने भी आते थे लेकिन उन्होंने कभी यह नहीं बताया कि उनका बेटा उदय अखबार बेचता है, यही उनकी महानता थी".
डॉक्टर मिश्र कहते हैं, "अगर उदय आज भी मुझसे मिलें तो मैं उनकी हरसंभव मदद करूँगा, यह मोहन लाल जी के प्रति मेरी श्रद्धांजलि होगी".
ईमानदारी
मुज़फ्फरपुर के 78 वर्षीय वैध महेंद्रनाथ ओझा मोहन लाल के समकालीनों में से हैं. वे कहते हैं, "उनकी ईमानदारी की एक मिसाल काफी है कि जब राम मनोहर लोहिया का देहांत हुआ तो वह उनके नाम पर खोले जाने वाले कॉलेज के लिए घूम-घूम कर चंदा जमा करते थे लेकिन कोई उनसे यह नहीं कहता था कि आप इसकी रसीद दें".
ओझा कहते हैं, "आज जब राजनीतिक नेताओं का ज़िक्र आता है तो सहसा एक भ्रष्ट आदमी की तस्वीर हमारी आँखों के सामने उभरती है. लेकिन मोहन लाल जी का नाम आते ही एक प्रेरणादायी व्यक्तित्व याद आता है".
उदय अखबार बेचकर हर महीने चार हज़ार रुपए कमा लेते हैं. वे कहते हैं यह रक़म इस ज़माने के हिसाब से कितना कम है, आप ख़ुद सोच सकते हैं.
पर उन्हें ख़ुशी है कि उनका बेटा दिल्ली में एमसीए की पढ़ाई कर रहा है जबकि दो बेटियाँ भी उच्च शिक्षा हासिल कर रही हैं.
उदय कहते हैं, "बस अफ़सोस यही है कि मैं लाखों रुपए के क़र्ज़ तले दबा हूँ".