भारत के विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी का कहना है कि यदि भारत अमरीका के साथ परमाणु समझौते के मुद्दे पर आगे नहीं बढ़ता है तो उसके अलग थलग पड़ने का ख़तरा है.
ये समझौता संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार को समर्थन दे रहे वामपंथी दलों के कड़े विरोध के कारण मुश्किल में पड़ गया है.
वामपंथी दलों का कहना है कि ये समझौता अमरीका को भारतीय विदेश नीति पर हावी होने का मौक़ा दे देगा.
उन्होंने धमकी दे रखी है कि यदि सरकार इस मुद्दे पर आगे बढ़ती है तो वे प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह सरकार से समर्थन वापस ले सकते हैं.
प्रणव मुखर्जी का कहना है कि यदि भारत इस समझौते को बीच में छोड़ देता है तो वह अलग थलग पड़ सकता है.
प्रणव मुखर्जी ने टेलीग्राफ़ समाचारपत्र से बातचीत में कहा,'' हम अलग थलग नहीं रह सकते हैं. यदि हम समझौते पर आगे नहीं बढ़े तो हम प्रतिबंध लग सकते हैं. हमें परेशानी पेश आ सकती है.''
वामदलों का अडंगा
गौरतलब है कि आईएईए के साथ पहले दौर की बातचीत वामपंथी दलों की ओर से मिली मंजूरी के बाद ही शुरू हुई थी.
बातचीत की मंज़ूरी इस शर्त पर दी गई थी कि किसी भी समझौते पर दस्तख़त नहीं किए जाएंगे और पूरे मामले पर यूपीए-वामपंथी समिति विचार करेगी.
इस मुद्दे पर संसद में भी चर्चा हुई थी जिसमे भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विभिन्न दलों की आशंकाओं को दूर करते हुए कहा था कि समझौता भारत को भविष्य में परमाणु परीक्षण करने के अधिकार से नहीं रोकता है.
लेकिन विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी का मानना है कि 123 समझौते में कई आपत्तिजनक बातें हैं जो राष्ट्रहित के ख़िलाफ़ हैं.
उनका कहना था कि अगर एनडीए फिर से सत्ता में आता है तो समझौते के आपत्तिजनक पहलुओं को हटाने के लिए अमरीका से बातचीत करेगा और अगर वह इन्हें हटाने पर राजी नहीं हुआ तो समझौता रद्द कर देगा.