शुक्रवार, 01 फ़रवरी, 2008 को 13:24 GMT तक के समाचार
नारायण बारेठ
बीबीसी संवाददाता, जयपुर
जिस किडनी कांड ने भारत में सनसनी पैदा कर दी, वह कभी जयपुर में अनायास ही सामने आया था. क़रीब साढ़े 12 साल पहले तत्कालीन पुलिस इंस्पेक्टर उम्मेद सिंह की सतर्कता से किडनी कांड से पर्दा उठा था.
वर्ष 1995 में 18 नवंबर का दिन उम्मीद सिंह को अब भी याद है. उस दिन लोगों में वाद-विवाद देख कर वह रुक गए और पूछा कि झगड़ क्यों रहे हो? तभी उनमें से एक ने बताया की उसे किडनी के पैसे नहीं मिले हैं.
उम्मेद सिंह बताते हैं, "मैं यह सुनकर चौंका. अचानक मुझे आभास हुआ की ये कोई बड़ा रैकेट है. मैंने सबको रोक लिया और पुलिस को बुलाया. जब इन लोगों को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई तो परतें खुलती चली गईं."
सिंह ने बीबीसी को बताया कि पुलिस जब तक इस मामले में आगे बढ़ती, इसका सूत्रधार डॉक्टर संतोष उर्फ़ अमित और सहयोगी जीवन भाग निकले. दोनों अब तक राजस्थान पुलिस के हाथ नहीं आए हैं.
पुलिस ने उस वक़्त हैदराबाद के हुसैन की रिपोर्ट पर डॉक्टर संतोष, जीवन और जयपुर के डॉक्टर सुरेश गुप्ता, मुंबई के बसंत फड़िया और नर्स सीमा सैयद के ख़िलाफ़ मामला दर्ज किया था.
तीन लोगों को सज़ा
इस मामले में जयपुर के फ़ास्ट ट्रैक कोर्ट ने गत वर्ष डॉक्टर सुरेश, बसंत और नर्स सीमा को सात-सात साल की सज़ा सुनाई थी.
मगर डॉक्टर संतोष और जीवन अब भी पुलिस की पकड़ से बाहर हैं. पुलिस ने दोनों को भागोड़ा घोषित कर रखा है.
हुसैन की शिकायत थी कि झाँसे में लेकर उसकी किडनी निकाल ली गई और उसे जयपुर के एक अस्पताल में सीरिया के किसी मुस्तफ़ा के शरीर में प्रत्यारोपित कर दिया गया.
किडनी के बदले हुसैन को महज़ 15 हजार रुपए मिले और विरोध करने पर मारपीट कर भगा दिया गया.
हालांकि डॉक्टर सुरेश, बसंत और सीमा ने ख़ुद को निर्दोष बताया लेकिन अदालत ने कहा कि इन लोगों ने पेशे की नैतिकता के विरुद्ध आचरण किया है.
हुसैन एक बार बयान देकर वापस नहीं लौटे, लेकिन अदालत के सामने ऐसे साक्ष्य थे जिसने इन लोगों को जेल भिजवा दिया.
उम्मेद सिंह बताते हैं कि उस वक़्त उनके सामने तीन ऐसे मामले आए थे. हुसैन के अलावा रामालु और मंजू मलय ने भी किडनी निकाले जाने का मामला दर्ज कराया था. मगर बाद में रामालु अपने बयानों से पलट गए और आरोपी बरी हो गए. मंजू मलय का मामला अब भी अदालत मे विचाराधीन है.
पूर्व पुलिस इंस्पेक्टर उम्मेद सिंह कहते हैं, "संतोष बहुत शातिर हैं, उनके सहयोगी पकड़ में आते हैं और वह बच निकलता है. लेकिन बाद में उन्होंने जयपुर को अपना अड्डा बना लिया. जब जयपुर में मामले खुलने लगे तो वह दूसरे राज्यों में चले गए, जिसका भेद अब सामने आया है."