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बुधवार, 30 जनवरी, 2008 को 12:06 GMT तक के समाचार

नारायण बारेठ
बीबीसी संवाददाता, जयपुर

अब बाड़मेर में किसान सड़कों पर उतरे

राजस्थान के सीमावर्ती बाड़मेर ज़िले में एक निजी कंपनी के बिजली संयंत्र लगाने के लिए ज़मीन अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरु होने के बाद वहाँ रोष प्रदर्शन शुरु हो गए हैं और ये विरोध आंदोलन का रुप लेता जा रहा है.

सरकार को इस संयंत्र के लिए पचास हज़ार बीघा से भी ज्यादा ज़मीन का अधिग्रहण करना है.

चाहे भूमि अधिग्रहण केवल 14 या 15 गाँव तक ही सीमित है लेकिन पूरे इलाक़े के लोगों में गुस्सा है. भयभीत गाँववासी सरकारी अफ़सरों को गाँव में आने से रोक रहे हैं और इलाक़े में तनाव पैदा हो गया है.

इस विरोध की शुरुआत तो चार महीने पहले हुई थी लेकिन उस समय गाँववासी ज़्यादा मुखर नहीं थे. लेकिन हाल में जब से भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरु हुई तब से जगह-जगह पर विरोध होना शुरु हो गया है.

किसानों की संघर्ष समिति के अध्यक्ष राम सिंह का दावा है कि ज़मीन गई तो पचास हज़ार परिवार प्रभावित होंगे.

बाड़मेर से भारतीय जनता पार्टी के सांसद मानवेन्द्र सिंह ने भी प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया है और कुछ अन्य राजनीतिक नेता भी गाँववासियों की हिमायत में आगे आ रहे हैं.

कई पंचायतें विरोध से जुड़ीं

बाड़मेर के सांसद मानवेन्द्र सिंह ने बीबीसी को बताया, "लोगों को बेदख़ल करने की क़ीमत पर ज़मीन अधिग्रहण ठीक नहीं है. हमारा नज़रिया
वही है जो नंदीग्राम के मामले मे था. हम उस अधिग्रहण के ख़िलाफ़ हैं जो लोगों को उजाड़े."

थार रेगिस्तान के इस इलाक़े मे कई पंचायतें इस विरोध से जुड़ गई हैं और कुछ चौराहों पर नोटिस चिपका दिए गए हैं कि यदि सरकारी कर्मचारियों ज़मीन अधिग्रहण के सिलसिले में गाँव में आएँ तो उन्हें वहाँ न घुसने दिया जाए.

राजस्थान सरकार के राजस्व विभाग के एक निरीक्षक खुमनाराम जब इन गाँवों में दाख़िल हुए तो उन्हें भारी विरोध झेलना पड़ा.

उनका कहना था, "जब हम गाँवों में पहुँचे तो महिलाएँ और बच्चे गाड़ियों के आगे लेट गए और कहने लगे कि हम अपनी ज़मीन नहीं देंगे."

खुमानाराम ने बताया, "हमें भूमि अधिग्रहण पर सर्वेक्षण करने के लिए भेजा गया था. लेकिन गाँव वाले लाख समझाने के बाद भी हमारी मदद नही कर रहे. हम तो केवल अपने अधिकारियों को ही बता सकते हैं."

भाजपा नेता और राज्यसभा मे विपक्ष के नेता जसवंत सिंह से पत्रकारों ने जब इस बाबत पूछा तो उन्होंने कहा, "मैं इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहता. लेकिन मेरा पक्का विचार है कि किसी निजी कंपनी के लिए यदि ज़मीन ली जा रही है, तो बिजली तभी काम आएगी जब रहने को घर होगा और ज़मीन होगी. जब लोगों को उजाड़ देंगे तो ऐसी बिजली का क्या होगा. हम यहाँ ऐसा नही होने देंगे."

किसानों की संघर्ष समिति के अध्यक्ष राम सिंह कहते हैं, "ये लोग सदियों से खेती और पशुपालन पर आश्रित हैं. अब कहाँ जाएँगे? ये ज़मीन इस इलाके की सबसे अच्छी ज़मीन है."

इसी इलाक़े में एक वार्ड पंच निमी कहती हैं, "चाहे जान चली जाए, हम अपनी ज़मीन नही देंगे."

उधर सरकार का कहना है कि बिजली की मांग बढ़ रही है, ऐसे में नए संयंत्र नही लगेंगे तो विकास कैसे होगा?