बुधवार, 30 जनवरी, 2008 को 12:47 GMT तक के समाचार
पीएम तिवारी
कोलकाता से
फ़्रेंकफ़र्ट और लंदन के बाद दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा पुस्तक मेला कोलकाता में इस साल आयोजित नहीं होगा.
कोलकाता पुस्तक मेले के 32 साल लंबे इतिहास में यह पहला मौका है जब इसका आयोजन नहीं किया जा रहा.
वैसे, इसके आयोजन पर तलवार तो पिछले कई वर्षों से लटक रही थी लेकिन इस साल अदालत की मनाही के बाद इसके आयोजक ‘पब्लिशर्स एंड बुकसेलर्स ग़िल्ड’ ने इसे नहीं करने का फैसला किया है.
यह मेला कोलकाता की सांस्कृतिक-साहित्यिक पहचान बन चुका था.
मेले का इतिहास
अब मंगलवार से ही टाउनहाल में एक सांकेतिक पुस्तक मेला शुरू हुआ है लेकिन इसमें बहुत कम प्रकाशक शामिल होंगे. इसके अलावा वहां जगह भी कम है.
महानगर के पार्क सर्कस मैदान में मंगलवार को इस 33वें मेले का उद्घाटन होना था. लेकिन इसके एक दिन पहले ही कलकत्ता हाईकोर्ट ने इससे इलाक़े की हरियाली को पहुंचने वाले ख़तरे की वजह से आयोजन की अनुमति देने से मना कर दिया.
वर्ष 1976 में महानगर के मैदान इलाके में पहली बार इस मेले का आयोजन किया गया था. तब यह मेला आठ दिनों तक चला था.
लोगों की मांग पर अगले साल से इसकी अवधि बढ़ा कर 12 दिन कर दी गई.
निराशा
पारंपरिक तौर पर यह मेला जनवरी के आख़िरी बुधवार से लेकर फ़रवरी के दूसरे रविवार तक आम लोगों के लिए खुला रहता था.
अब इस साल इसका आयोजन ठप्प होने के बाद तमाम साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने अदालत के फ़ैसले पर निराशा जताई है.
मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य ने इसे ‘दुर्भाग्यपूर्ण’ करार दिया है.
जाने-माने उपन्यासकार सुनील गंगोपाध्याय कहते हैं कि इस साल मेले का नहीं होना पुस्तकप्रेमियों के लिए एक बड़ा सदमा है.
वे कहते हैं, "इसका असर प्रकाशकों पर भी पड़ेगा. ख़ासकर छोटे प्रकाशकों को सबसे ज़्यादा नुकसान होगा. कई विदेशी मेहमान मेले में शिरकत करने यहां पहुंच चुके हैं या पहुंचने वाले हैं."
वे सवाल करते हैं, "आख़िर हम उन लोगों को क्या जवाब दें?"
साहित्य अकादमी के क्षेत्रीय सचिव राम कुमार मुखर्जी कहते हैं, "सरकार और आयोजकों को मिल कर पुस्तक मेले की इस समस्या का कोई स्थाई हल निकालना चाहिए."
नुकसान
राम कुमार मुखर्जी कहते हैं कि मेला शहर के पास ही होना चाहिए. बीते साल मेला साल्टलेक में आयोजित होने की वजह से किताबों की बिक्री एक-तिहाई रह गई थी.
मेले में पंडाल बनाने और इसकी सजावट में जुटे लोगों को भी भारी नुकसान हुआ है.
डेकोरेटर मुख्तार एंड कंपनी के मालिक एम मुख्तार कहते हैं, "हमारा लाख़ों का नुकसान हो गया है. आयोजकों ने कहा था कि पैसे पुस्तक मेला आयोजित होने की स्थिति में ही मिलेंगे."
पब्लिशर्स एंड बुकसेलर्स ग़िल्ड के सचिव त्रिदीब चटर्जी कहते हैं, "वैकल्पिक जगह नहीं मिलने की सूरत में मेले का आयोजन नहीं करने का फैसला किया गया है."
वे कहते हैं कि अदालत के फैसले से लाखों पुस्तकप्रेमियों को झटका लगा है.
जनहित याचिका
चटर्जी इस बात से नाराज़ हैं कि इतने लंबे अरसे से आयोजनस्थल पर विवाद चलने के बावजूद सरकार महानगर या आसपास के इलाके में अब तक कोई स्थाई मेला परिसर नहीं बना सकी है.
कलकत्ता हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश एसएस निज्जर ने स्थानीय लोगों की ओर से दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई के बाद खुद प्रस्तावित मेला स्थल का दौरा किया.
उन्होंने अपने फैसले में कहा कि इलाके में कई स्कूल-कालेज व दो-दो अस्पताल हैं. ऐसे में मेले के आयोजन से प्रदूषण अधिनियम, पर्यावरण सुरक्षा अधिनियम और ध्वनि प्रदूषण अधिनियम का उल्लंघन होगा.
लेटिन अमेरिकी देश पहली बार इस मेले में शिरकत कर रहे थे इसलिए उन्होंने काफ़ी ख़र्च किया था लेकिन अब वे हताश हैं.
डोमिनियन रिपब्लिक के राजदूत हैंस डेनेनबर्ग कहते हैं, "पुस्तक मेला भारत और लेटिन अमेरिकी देशों के और क़रीब आने के सुनहरा मौका था लेकिन मेले का नहीं होना निराशाजनक है."
आयोजक ज़िम्मेदार
शीर्षेंदु मुखर्जी जैसे साहित्यकार इस स्थिति के लिए आयोजकों को ज़िम्मेदार ठहराते हैं, "अदालत ने जब मैदान में मेले के आयोजन पर रोक लगाई थी, तभी ग़िल्ड को वैकल्पिक मेला परिसर तलाशना चाहिए था लेकिन उसने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया."
पुस्तक मेले के आयोजन को लेकर विवाद अक्तूबर, 2002 में उस समय शुरू हुआ जब पर्यावरणविद् सुभाष दत्त ने अदालत में एक जनहित याचिका दायर कर विक्टोरिया मेमोरियल के नजदीक मेलों के आयोजन पर पाबंदी लगाने की मांग की.
अगले साल नवंबर में अदालत ने सरकार को सभी मेलों को दूसरी जगह ले जाने का निर्देश दिया लेकिन सरकार ने अदालत से एक स्थाई मेला परिसर बनाने के लिए कुछ और समय मांगा.
वर्ष 2006 में सरकार ने अदालत से अंतिम बार मैदान में पुस्तक मेला आयोजित करने की अनुमति मांगी. अदालत ने अनुमति दे दी.
पाबंदी
अगले साल 2007 में सरकार ने सेना जिसके नियंत्रण में मैदान इलाका है, से पुस्तक मेले की अनुमति मांगी लेकिन सेना ने मना कर दिया.
बाद में विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी की मध्यस्थता से दिल्ली से रक्षा मंत्रालय ने इसे हरी झंडी दी लेकिन इसके खिलाफ दायर जनहित याचिका के आधार पर अदालत ने मेले के आयोजन पर पाबंदी लगा दी.
उस साल साल्टलेक स्टेडियम परिसर में इसका आयोजन किया गया लेकिन इसकी रंगत फीकी रही. इस साल आयोजकों ने इसे पार्क सर्कस मैदान में आयोजित करने का ऐलान किया था.
कोलकाता नगर निगम ने इसे मंज़ूरी भी दे दी. लेकिन ठीक एक दिन पहले अदालत ने इस पर रोक लगा दी.