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बुधवार, 23 जनवरी, 2008 को 12:09 GMT तक के समाचार

फ़ैसल मोहम्मद अली
बीबीसी संवाददाता, भोपाल

कुप्रचार से भरे पर्चों के चर्चे

सुस्त शहर भोपाल में एक चीज़ जो तेज़ी से चलती है वह है यहाँ के पर्चे.

राजनेताओं, अफ़सरों, पत्रकारों, कलाकारों के काल्पनिक शारीरिक संबंधों, कथित रिश्वतखोरी की घटनाओं, आदि की कथित "आँखों देखी" बयान करते एक या दो पन्नों के पर्चे अक्सर नज़रों से गुज़रते हैं.

कभी टाइप किए हुए और कभी बाक़ायदा छपे हुए इन पर्चों में कभी कुप्रचार कहानियों की शक़्ल में होता है तो कभी व्यंग्य और कविता के रूप में, अक्सर भाषा काफ़ी फूहड़ होती है.

मध्य और उत्तर भारत के कई शहरों में रह चुके पत्रकार एनडी शर्मा कहते हैं कि शिमला और दिल्ली में एकाध दफ़ा ऐसे पर्चे उनकी नज़रों से गुज़रे हैं लेकिन भोपाल में तो इनका चलन ज़बरदस्त है.

ग़ुमनाम चिट्ठी

उनके पास ऐसे पर्चों की पूरी एक फाइल है.

भ्रष्ट पत्रकारों और पत्रकारिता के रावणों का ‘मुंह काला’ करते 'जनहित में जारी’ हाल के चाँद पर्चों के अलावा इनमें भाजपा नेता अरुण जेटली से मध्य प्रदेश के "थ्री डीज़", यानी, दिग्विजय सिंह, दाउद इब्राहीम और दलालों से बचने की गुहार करती ग़ुमनाम चिट्ठी भी शामिल है.

साथ ही, दिग्विजय सिंह के "दर्दे बयां" के प्रमुख अंश भी जिसमें उनकी ओर से कथित तौर पर कहा गया है कि किन-किन पत्रकारों ने उन पर दबाव बनाकर उनसे माल और फ़ायदा ऐंठा.

राजस्थान पत्रिका अख़बार के एक कॉलम में इस मामले की जाँच भी उठी और दिग्विजय सिंह से सवाल भी किए गए कि ‘इतनी अंदर की बात किसी और को कैसे पता चली?’

मज़ा लेने के लिए

इस पर पूर्व मुख्यमंत्री ने इसकी पुलिस जांच करवाने का अश्वासन नाराज़ मीडियाकर्मियों को दिया.

साहित्यकार राम प्रकाश त्रिपाठी कहते हैं कि "तालों के शहर भोपाल में देर रात तक गप्पों का दौर चलता था. यह मज़ा लेने के लिए किया जाता था चाहे इसमें कोई खीजे या परेशान हो."

वे कहते हैं, "चूँकि शहर छोटा था, सब एक दूसरे को जानते थे तो ऐसी कोई भी अफ़वाह इलाके में सनसनी फैला देती थी और लोग आनंद लेते थे."

कवि राजेश जोशी के अनुसार कभी-कभी यह सिर्फ़ इसलिए किया जाता था कि "कुछ हो नहीं रहा है, बोरियत हो रही है, शहर बड़ा शांत है, मतलब अफ़वाह उड़ाओ."

हँसते हुए वह बताते हैं कि एक बार जब काफ़ी अरसे तक शहर में सुस्त सी फ़िज़ा रही तो एक अफ़वाह उड़ाई गई कि भोपाल में ज्वालामुखी फूटा है, बिजली के खंभे पिघल गए है. लोगों को जला हुआ पत्थर तक लाकर दिखाया गया.

एक मुंह से दूसरे मुंह होती हुई शहर में फैलाई जाने वाली अफ़वाहें 70 का दशक आते-आते कागजों यानी पर्चों के माध्यम से लोगों तक पहुँचने लगीं.

ध्यान हटाने के लिए

तत्कालीन मुख्यमंत्री कैलाश जोशी की नींद को लेकर इतनी बातें फैलीं कि अंततः उनकी कुर्सी ही खिसक गई.

कभी निर्मल आनंद के लिए चलाई गई गप्पों का फायदा साधने के लिए इस्तेमाल होने का दौर आ गया था.

राजेश जोशी एक काल्पनिक पात्र चम्पतिया का किस्सा सुनाते हैं जिनके बारे में यह बात फैली कि वह आसमान में दिखते हैं और जो भी उन्हें गाली देगा वह उसे पत्थर मारेंगे.

उन्हें देखने को भीड़ उमड़ती, उसी भीड़ में से कोई पत्थर उछाल देता और हल्ला होता वह रहा चम्पतिया वह रहा चम्पतिया.

यह अफ़वाह, उनके अनुसार उस सेक्स स्कैंडल से लोगों का ध्यान हटाने के लिए फैलाई गई थी जो तभी भोपाल में सामने आया था और जिसमें शहर के बड़े-बड़े लोग शामिल थे.

राम प्रकाश त्रिपाठी कहते हैं, छोटा शहर अब मैट्रो में तब्दील हो रहा है और इसी के साथ कभी निर्मल आनंद के लिए अफ़वाह फैलाने की मज़ेदार परंपरा इतनी विकृत हो चुकी है.