शुक्रवार, 11 जनवरी, 2008 को 03:09 GMT तक के समाचार
पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को भारत रत्न देने की लालकृष्ण आडवाणी की माँग पर विवाद खड़ा हो गया है.
इसे लेकर अब सत्तापक्ष और प्रमुख विपक्ष भाजपा के बीच बयानबाज़ी का दौर चल रहा है.
उल्लेखनीय है कि भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न की घोषणा आमतौर पर गणतंत्र दिवस, 26 जनवरी की पूर्व संध्या पर की जाती है.
लोकसभा में विपक्ष के नेता और वरिष्ठ भाजपा नेता लालकृष्ण आडवाणी ने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखकर माँग की है कि अटल बिहारी वाजपेयी को सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' से सम्मानित किया जाना चाहिए.
उन्होंने गत पाँच जनवरी को यह पत्र लिखा था.
इसके बाद इसकी ख़बरें मीडिया में भी आ गईं थीं.
उन्होंने अपने पत्र में लिखा, "मैं इस साल भारत रत्न देने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी के नाम का प्रस्ताव कर रहा हूँ. भारत के राष्ट्रीय जीवन में उनका योगदान सर्वविदित है. वे लंबे समय से योगदान दे रहे हैं और इसके लिए उन्हें किसी और अनुशंसा की ज़रुरत नहीं है."
आडवाणी ने अपने पत्र में इस बात को लेकर खेद जताया है कि कई बार भारत रत्न का सम्मान किसी को नहीं दिया गया.
उन्होंने अपने पत्र में कहा, "कई बार भारत रत्न के लिए उन लोगों के नामों की अनुशंसा हुई जो जीवित नहीं थे लेकिन उसी समय भारत रत्न पाने योग्य कई बड़े भारतीय मौजूद थे."
उल्लेखनीय है कि इंदिरा गाँधी अकेली प्रधानमंत्री रही हैं जिन्हें जीते जी भारत रत्न दिया गया. राजीव गाँधी को यह सम्मान उनकी मृत्यु के बाद दिया गया था.
बयानबाज़ी
लालकृष्ण आडवाणी के इस पत्र को लेकर बयान की शुरुआत सूचना एवं प्रसारण मंत्री प्रियरंजन दासमुंशी के बयान से शुरु हुई है.
आडवाणी के पत्र पर प्रतिक्रिया माँगे जाने पर उन्होंने कहा है कि भारत रत्न का फ़ैसला पत्र लिखकर नहीं किया जाता.
समाचार एजेंसी पीटीआई के अनुसार उन्होंने कहा, "ऐसे विषयों पर पत्र लिखने की परंपरा नहीं है."
उन्होंने कहा कि वे नहीं जानते कि लालकृष्ण आडवाणी ने यह पत्र क्यों लिखा है और 'आडवाणी जी को चाहिए कि वे वाजपेयी जी को पार्टी के भीतर सम्मानित कर लें.'
इस पर भाजपा ने तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त की है.
पूर्व केंद्रीय मंत्री राजीव प्रताप रूडी ने इस बयान पर आपत्ति जताते हुए कहा, "नेता प्रतिपक्ष और प्रधानमंत्री के बीच हुए पत्रव्यवहार का एक केंद्रीय मंत्री से क्या लेना देना."
उन्होंने कहा है कि प्रियरंजन दासमुंशी को इस बात का हक़ नहीं था कि वे इस मामले में टिप्पणी करते.
हालांकि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस पर कोई टिप्पणी नहीं की है.
जब उनसे लालकृष्ण आडवाणी के पत्र के बारे में पूछा गया तो उन्होंने सिर्फ़ इतना ही कहा, "मुझे पत्र मिला है."