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शनिवार, 05 जनवरी, 2008 को 12:46 GMT तक के समाचार

दिल्ली में पहचान-पत्र रखना ज़रूरी

दिल्ली के उप राज्यपाल ने घोषणा की है कि 15 जनवरी के बाद से दिल्ली में लोगों को अपनी पहचान का एक प्रमाणिक दस्तावेज़ लेकर चलना ज़रूरी होगा.

बीबीसी से बातचीत में उप राज्यपाल तेजेंदर खन्ना ने बताया कि ऐसा पिछले कुछ वर्षों में दिल्ली में हुई चरमपंथी गतिविधियों को ध्यान में रखते हुए किया गया है.

उन्होंने कहा कि पहचान पत्र ज़रूरी करने का फ़ैसला इसलिए लिया गया है ताकि इस बात की पहचान की जा सके कि कौन लोग विदेशी हैं और कौन भारतीय नागरिक. इससे सुरक्षा व्यवस्था को चुस्त करने में मदद मिलेगी.

हालाँकि उन्होंने स्पष्ट किया, "ऐसा नहीं है कि लोगों की जाँच हर वक़्त, हर जगह की जाएगी. लोगों के पहचान पत्र देखने का काम अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग समय पर किया जाएगा."

तेजेंदर खन्ना ने बताया कि जिन लोगों के पास पूछताछ के दौरान पहचान पत्र नहीं होगा, उन्हें थाने या जेल भेज दिया जाएगा. उन लोगों से पुलिस पूछताछ करेगी और संदेह होने पर ही आगे कोई कार्रवाई की जाएगी.

जब यह सवाल पूछा गया कि इस घोषणा के प्रभावी होने के बाद उन लोगों का क्या होगा जो दूसरे राज्यों से आकर दिल्ली में रह रहे हैं और जिनके पास पहचान का कोई पुख़्ता दस्तावेज़ नहीं है तो इसपर उन्होंने कहा, "जिन लोगों के पास पहचान पत्र नहीं हैं, उन्हें एसडीएम कार्यालय जाकर अपनी पहचान का दस्तावेज़ बनवाना होगा क्योंकि सुरक्षा के लिए यह ज़रूरी है और इससे कोई समझौता नहीं किया जा सकता है."

उप राज्यपाल ने बताया कि यह केवल राष्ट्रीय पर्वों के मद्देनज़र नहीं है बल्कि दिल्ली के लिए इसे एक स्थाई व्यवस्था के तौर पर लागू किया जाएगा.

ग़ैर-ज़रूरी फ़ैसला

वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने दिल्ली में पहचान पत्र की अनिवार्यता को ग़ैर-ज़रूरी बताते हुए कहा है कि इससे ग़रीब लोगों पर अनावश्यक दबाव बनेगा और लोगों को इससे परेशानी ही होगी.

उन्होंने इस आदेश को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि इससे चरमपंथ पर शायद ही कोई लगाम लगे क्योंकि जिनको ऐसी गतिविधियों का अंजाम देना होगा वे फ़र्जी पहचान पत्र लेकर दिल्ली में आ सकते हैं.

प्रशांत भूषण ने चिंता जताई कि दिल्ली में रोज़ाना हज़ारों की तादाद में बाहर के राज्यों से लोग आते हैं. इन लोगों के लिए पहचान पत्र दिखा पाना संभव नहीं होगा. इससे इनका शोषण भी होगा और भ्रष्टाचार भी बढ़ेगा.

उन्होंने स्पष्ट किया कि उप राज्यपाल के इस फ़ैसले को अदालत में चुनौती भी दी जा सकती है.