गुरुवार, 03 जनवरी, 2008 को 10:53 GMT तक के समाचार
पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो की हत्या के बाद राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ को हटाने की मांग तेज़ हो गई है.
विपक्षी पार्टियों के अलावा एक स्वतंत्र शोध संस्था इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप ने भी मुशर्रफ़ के इस्तीफ़े की मांग की है.
संस्था ने तो यहाँ तक कह दिया है कि अगर मुशर्रफ़ अपना पद नहीं छोड़ते तो यह सेना के हित में है वह अपने पूर्व प्रमुख से नाता तोड़ ले.
बुधवार को पाकिस्तान के चुनाव आयोग ने देश की स्थिति को देखते हुए आम चुनाव आठ जनवरी की बजाए 18 फरवरी को कराने की घोषणा की थी.
27 दिसंबर को रावलपिंडी में एक रैली के बाद पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो की हत्या कर दी गई थी.
पहले पाकिस्तान सरकार ने बेनज़ीर भुट्टो की हत्या की जाँच में किसी अंतरराष्ट्रीय हस्तक्षेप से इनकार कर दिया था लेकिन अब सरकार स्कॉटलैंड यार्ड से जाँच में सहयोग के लिए तैयार हो गई है.
लेकिन बेनज़ीर भुट्टो की पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने संयुक्त राष्ट्र से हत्या की जाँच कराने की मांग की है. पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की पार्टी ने तो परवेज़ मुशर्रफ़ के इस्तीफ़े की मांग की है.
पार्टी के वरिष्ठ नेता जावेद हाशमी ने कहा, "मुशर्रफ़ के नेतृत्व में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संभव नहीं. अगर वे अपने पद पर बने रहते हैं तो ये चीज़े सोची भी नहीं जा सकती."
इस्तीफ़े की मांग
इस बीच ब्रसेल्स स्थित शोध संस्था इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप ने अपनी रिपोर्ट में अमरीका से अपील की है कि वे राष्ट्रपति मुशर्रफ़ को समर्थन देना बंद करें. संस्था ने अमरीका से कहा है कि वह मुशर्रफ़ को बोझ समझे.
ग्रुप के एशिया निदेशक रॉबर्ट टेम्पलर ने रिपोर्ट के साथ जारी अपने बयान में कहा, "जब तक मुशर्रफ़ इस्तीफ़ा नहीं देते, देश में तनाव और बढ़ेगा. अंतरराष्ट्रीय समुदाय को एक परमाणु हथियार संपन्न मुस्लिम देश को गृह युद्ध की ओर बढ़ता देखना पड़ सकता है."
वर्ष 1999 में नवाज़ शरीफ़ का तख़्ता पलट कर परवेज़ मुशर्रफ़ ने सत्ता हथियाई थी. बुधवार को राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में मुशर्रफ़ ने चुनाव टाले जाने को उचित ठहराया.
बेनज़ीर भुट्टो की हत्या की जाँच स्कॉटलैंड यार्ड से कराने की घोषणा का अमरीका ने समर्थन किया. लेकिन इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप का कहना है कि मुशर्रफ़ के कारण अब पाकिस्तान में स्थिरता नहीं आ सकती.
संस्था ने अपनी रिपोर्ट में यहाँ तक कह दिया है कि अगर राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ख़ुद इस्तीफ़ा नहीं देते, तो सेना को अपने पूर्व प्रमुख से नाता तोड़ लेना चाहिए और यही सेना के भी हित में है.