शनिवार, 29 दिसंबर, 2007 को 04:08 GMT तक के समाचार
सैयद शोएब हसन
बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
बैतुल्ला महसूद पाकिस्तान के अशांत दक्षिणी वज़ीरिस्तान में तालेबान समर्थक कबायली नेताओं में एक बड़ा नाम है.
लेकिन कुछ खासियत उसे दूसरों से अलग करती है. बैतुल्ला से मिल चुके कुछ पत्रकार बताते हैं कि वो इस्लामी मान्यताओं का ख़ुद विश्लेषण करते हैं और उसके आधार पर अपनी गतिविधियों को जायज ठहराते हैं.
यहाँ पर ज़ोर अफ़ग़ानिस्तान में विदेशी ताकतों के ख़िलाफ़ जेहाद और एक इस्लामी राज्य की स्थापना पर होता है.
इसमें आत्मघाती विस्फोट का इस्तेमाल और अफ़ग़ानिस्तान में मौजूद अंतरराष्ट्रीय सेना के ख़िलाफ़ सीमा-पार से हमले करना शामिल है.
बैतुल्ला प्रचार के सख़्त ख़िलाफ़ हैं और ख़ास कर फोटो खिंचवाने में कोई रुचि नहीं है.
इस कबायली कमांडर से मिल चुके एक पत्रकार बताते हैं, "वो कभी भी अपनी तस्वीर लेने नहीं देते."
उनकी सोच सर्वोच्च तालेबान कमांडर मुल्ला उमर से मेल खाती है जो ख़ुद तस्वीरों से घृणा करते हैं. ऐसा माना जाता है कि बैतुल्ला और मुल्ला उमर के बीच अच्छे संबंध हैं.
अफ़ग़ानिस्तान में भूमिका
जैसा कि नाम से ज़ाहिर है, बैतुल्ला महसूद का ताल्लुक दक्षिणी वज़ीरिस्तान के महसूद कबायली समुदाय से है.
यह इलाक़ा अल क़ायदा और तालेबान के लिए सुरक्षित पनाहगार माना जाता है.
बैतुल्ला के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने इस इलाक़े में बड़ी संख्या में उन लड़ाकों को पनाह दी जो अफ़ग़ानिस्तान में हमले करते हैं.
बैतुल्ला इस सच्चाई को छिपाने की कोशिश भी नहीं करते हैं. उनका मानना है कि सभी मुसलमानों का यह कर्तव्य है कि वे 'अमरीका और ब्रिटेन की काफ़िर सेना' के ख़िलाफ़ जेहाद छेड़ें.
इसी साल शुरु में बीबीसी से बात करते हुए बैतुल्ला ने कहा था कि चरमपंथी जेहाद के रास्ते अफ़ग़ानिस्तान को मुक्त कराने के लिए कटिबद्ध हैं.
उनका कहना था, "सिर्फ़ जेहाद ही दुनिया में शांति ला सकता है."
बैतुल्ला ने कई बार स्वीकार किया है कि वो विदेशी सेना से लड़ने अफ़ग़ानिस्तान गए.
जब इस साल अक्तूबर में बीबीसी की और टीम उस इलाक़े में गई तो उनके प्रवक्ता ज़ुल्फ़िकार ने बताया कि वो अफ़ग़ानिस्तान में लड़ रहे हैं.
लादेन से संपर्क
9/11 की घटना के बाद से बैतुल्ला का रुतबा और उनकी ताकत बढ़ी है और वह वज़ीरिस्तान इलाक़े में सबसे प्रमुख तालेबान समर्थक कमांडर बन कर उभरे हैं.
उनके बारे में कहा जाता है कि वो अफ़ग़ानिस्तान के चर्चित तालेबान कमांडर जलालुद्दीन हक्क़ानी के मातहत काम कर चुके हैं.
ऐसा माना जाता है कि हक्क़ानी ने ही वर्ष 2002 में तोरा-बोरा इलाक़े में अमरीकी बमबारी से ओसामा बिन लादेन के बचाने में मदद की थी.
जानकारी के मुताबिक बैतुल्ला के पास लगभग बीस हज़ार तालेबान समर्थक लड़ाके हैं. इनमें से अधिकतर महसूद कबीले से हैं.
ख़ुफ़िया रिपोर्ट के मुताबिक विदेशी लड़ाकों की बड़ी संख्या भी इसमें शामिल है.
हालाँकि जब मैंने अक्तूबर में इस इलाक़े का दौरा किया तो मुझे कोई विदेशी नहीं दिखा.
सेना के साथ झड़प
पाकिस्तानी सेना ने इस इलाक़े को चरमपंथियों से मुक्त कराने के लिए कई अभियान चलाए लेकिन कामयाबी नहीं मिली.
चरमपंथियों के साथ सरकार ने दो समझौते भी किए. आख़िरी समझौते पर फरवरी 2005 में महसूद ने ही दस्तख़त किए थे.
पाकिस्तान में हुए अधिकतर आत्मघाती हमलों के पीछे बैतुल्ला का हाथ बताया जाता है.
वो ख़ुद सेना से जुड़े प्रतिष्ठानों पर हमले की बात स्वीकार करते हैं लेकिन उन्होंने किसी राजनेता की हत्या में हाथ होने से स्पष्ट इनकार किया है.
उनका कहना है कि 18 अक्तूबर को बेनज़ीर पर हुए हमले से उनका कोई लेना-देना नहीं था.
बेनज़ीर पर हुए इस पहले हमले से ठीक पूर्व जब इस संवाददाता ने चरमपंथियों से बात की तो पाया कि वो बेनज़ीर के धुर विरोधी हैं.
जब हम उस इलाक़े से लौट रहे थे तब बैतुल्ला के प्रवक्ता ने कहा था कि आज नहीं तो कल बेनज़ीर को वो मिलेगा जिसकी वो हक़दार हैं.