गुरुवार, 27 दिसंबर, 2007 को 18:15 GMT तक के समाचार
पॉल रेनाल्ड्स,
बीबीसी, विश्व मामलों के विशेषज्ञ
पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो की हत्या पाकिस्तान के स्थायित्व के लिए बहुत बड़ा खतरा साबित हो सकती है.
उनकी हत्या से अंतरराष्ट्रीय समुदाय सकते में है जो इस उम्मीद में था कि बेनज़ीर साथ पाकिस्तान में एक बार फिर लोकतंत्र की बहाली हो सकती है.
बेनज़ीर की मौत और वो भी ऐसे हमले में, अमरीका के ' आतंक के ख़िलाफ युद्ध ' के लिए भी बहुत अशुभ संकेत माना जा सकता है क्योंकि चरमपंथ और अलगाववाद से लड़ाई की अमरीकी रणनीति में बेनज़ीर की एक महत्वपूर्ण भूमिका बन रही थी.
अब यह अमरीकी रणनीति खटाई में पड़ सकती है.
बेनज़ीर की मौत ऐसे समय में हुई है जब दो हफ्ते बाद देश में चुनाव होने वाले हैं.
धमकियों और हमलों की चेतावनियों और कुछ असफल आत्मघाती हमलों के बावज़ूद बेनज़ीर ने प्रचार अभियान जारी रखा जो उनकी दिलेरी का सबूत माना जा सकता है.
इससे पहले अक्तूबर में जिस दिन बेनज़ीर पाकिस्तान पहुंची थी, उनके क़ाफिले पर हमला हुआ था.
इस हमले से अब एक बार साबित हो गया है कि पाकिस्तान में चरमपंथी जब और जहां चाहे हमला कर सकते हैं.
अकूतबर से लेकर अब तक पाकिस्तान की राजनीति में जो कुछ भी हो रहा था उससे लग रहा था कि मुशर्रफ़ चुनावों के ज़रिए न केवल लोकतांत्रिक व्यवस्था कायम करने की कोशिश में है बल्कि देश को स्थायित्व देने की कोशिश कर रहे हैं.
माना जा रहा था कि चुनावों के बाद जब कोई सरकार बनेगी तो राजनेता सेना और चरमपंथियों के बीच संघर्ष को कम करने की कोशिश कर सकेंगे, क्योंकि यह संघर्ष पाकिस्तान के हित में नही है.
अब अगर पाकिस्तान के राष्ट्रपति और पाकिस्तान की सेना यह तय करती है कि चुनाव का विकल्प बेहतर नहीं रहा है तो एक बार फिर देश में सैनिक शासन लग सकता है.
पाकिस्तान में पहले भी ऐसा हो चुका है.
ऐसा नहीं है कि बेनज़ीर के जीतने से पाकिस्तान में स्थायित्व आ जाता लेकिन इसमें कोई शक नहीं है कि उनका करिश्माई व्यक्तित्व एक स्तर पर पाकिस्तानी जनता को जोड़ने में ज़रुर मदद करता जिसकी पाकिस्तान को बहुत ज़रुरत है.