शनिवार, 15 दिसंबर, 2007 को 16:17 GMT तक के समाचार
विनीत खरे
बीबीसी संवाददाता, शिमला से
हिमाचल प्रदेश में 19 दिसंबर को होने वाले दूसरे चरण के चुनाव के लिए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी शिमला में हैं.
उन्होंने शनिवार को शिमला में एक चुनाव रैली को संबोधित किया.
सोनिया गांधी ने युवाओं को नौकरियां देने और बेहतर उच्च शिक्षा देने की बात उठाई.
सोनिया से पहले भी कांग्रेस नेताओं ने युवाओं की रोज़गार समस्याओं के बारे में ही बात की. पार्टियों को पता है कि बढ़ती बेरोज़गारी इन चुनावों में सबसे बड़ा मुद्दा है.
कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों ने ही अपने चुनाव घोषणा पत्रों में रोज़गार के अवसरों को बढ़ाने की बात की है.
बेरोज़गारी
बेरोज़गारी की ये समस्या वैसे तो देशव्यापी है, लेकिन हिमाचल में ये समस्या कितनी गंभीर है, ये जानने के लिए मैने बात की मनोज तोमर से, जो श्रम और रोज़गार कार्यालय में उप निदेशक हैं.
मनोज तोमर कहते हैं, "31 अक्टूबर 2007 को हिमाचल रोज़गार कार्यालय में कुल मिलाकर सात लाख 82 हजा़र सात सौ चालीस लोगों के नाम दर्ज थे. कुल पंजीकृत आवेदकों में से 45.73 प्रतिशत लोग ही वास्तव में बेरोज़गार हैं. वे कहते हैं कि अगर हम मान लें कि हिमाचल की जनसंख्या साठ, पैंसठ लाख है तो भी अगर पौने चार लाख का आंकड़ा आता है तो काफ़ी है."
लोगों का कहना है कि हिमाचल में साक्षरता तो है, लेकिन उनमें तकनीकी हुनर का अभाव है. सरकार ने तकनीकी शिक्षा में उतना निवेश नहीं किया है, जितना करना चाहिए.
सूचना प्रोद्यौगिकी औ बायोटेक्नॉलजी जैसे विषयों में तकनीकी रूप से कुशल लोगों की ज़रूरत है.
इस बारे में ज़्यादा जानने के लिए मैने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्याल में कुछ छात्रों से बात की.
सिर्फ़ वादे नहीं
पीएचडी कर रहे संजीव कुमार वर्मा सरकारी नौकरियों के कम होने के लिए नीतियों को दोषी मानते हैं. वे कहते हैं कि जो सरकारी नौकरियां निकलती भी हैं, वहां नेताओं के जान पहचान वाले लोग कब्ज़ा कर लेते हैं.
बहुजन समाज पार्टी के हिमाचल में चुनाव लड़ने के बारे में छात्रों ने कहा कि इसी पार्टी ने कई लोगों को उत्तर प्रदेश में नौकरियों से निकाल दिया था.
प्रोफ़ेसर रोमेश चौहान हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में राजनीतिशास्त्र पढाते हैं. वे कहते हैं कि पार्टियों ने वायदे तो खूब किए, लेकिन उन्हें निभाया नहीं. वे कहते हैं कि आज के युवा वादों में यकीन नहीं करते हैं.
वे चाहते हैं कि राजनीतिक दल 10-15 वादों की जगह मात्र चार या पांच वादे करें, जिनमें से तीन या चार वादों को पूरा करने के लिए सार्थक प्रयास करें.
बात साफ़ है, नीति स्तर पर सब कुछ ठीक नहीं है, और युवाओं की ज़रूरतों को और ज़्यादा समझने की आवश्यकता है क्योंकि वे सिर्फ़ वायदों
पर यकीन करने वाले नहीं.