गुरुवार, 13 दिसंबर, 2007 को 01:51 GMT तक के समाचार
फ़ैसल मोहम्मद अली
बीबीसी संवाददाता, भोपाल
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में मंगलवार को एशिया का पहला बाल अधिकार पर्यवेक्षक मंच यानी 'चाइल्ड राइट्स ऑवजरवेटरी' की स्थापना हुई है.
बच्चों के अधिकारों के लिए विशेष तौर पर काम करने वाली ऐसी संस्था अभी तक सिर्फ़ कुछ यूरोपीय, अफ्रीका और लातिन अमरीकी देशों में थीं.
राज्य सरकार, स्वयंसेवी संस्थाओं और बच्चों के कल्याण के लिए काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र की संस्था यूनिसेफ़ के समन्वय से बाल अधिकार पर्यवेक्षक मंच स्थापित किया गया है.
यह मंच बाल अधिकारों के लिए जागरूकता फैलाने, इस क्षेत्र में काम करने वाली संस्थाओं को सहयोग देने के अलावा बच्चों से संबंधित क़ानूनों की तैयारी में सरकार की मदद करेगा.
बाल अधिकार मंच की अध्यक्ष निर्मला बुच का कहना है की यह संस्था इस क्षेत्र में काम करने वाली सभी एजेंसियों को एकजुट करने का काम करेगी जिससे बाल अधिकारों की सुरक्षा के लिए चल रहा अभियान और मज़बूत होगा.
यह मंच संयुक्त राष्ट्र के 'कन्वेंशन ऑव चाइल्ड राइट्स' को मध्य प्रदेश में लागू करवाने का प्रयास करेगा. साथ ही बच्चों की सामाजिक स्थिति पर शोध भी मंच के उद्देश्यों में शामिल हैं.
संयुक्त राष्ट्र महासभा के वर्ष 1989 में पारित एक घोषणा पत्र में बच्चों को जन्म से पहले और बाद में पूरी क़ानूनी और सामजिक सुरक्षा की बात कही गई है.
अमरीका और सोमालिया को छोड़कर विश्व के सभी देश इस घोषणा पत्र को अपना चुके हैं.
दयनीय स्थिति
इसके बावजूद विश्व भर में बच्चों की स्थिति दयनीय है.
हाल की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया भर में 11करोड़ 50 लाख से अधिक बच्चों को प्रारंभिक शिक्षा नहीं मिल पाती है और क़रीब 18 लाख बच्चे देह व्यापार में ज़बरदस्ती धकेल दिया जाते हैं.
यही नहीं हर वर्ष दुनिया भर में 27 करोड़ 50 लाख बच्चे घरेलू हिंसा का शिकार होते हैं यानी जो हिंसा माता पिता या अन्य परिवारजनों के ज़रिए उन पर की जाती है.
मध्यप्रदेश में यूनिसेफ़ के मुख्य अधिकारी हामिद अल बशीर कहते हैं कि राज्य में बाल अधिकारों की दयनीय स्थिति के मद्देनज़र बाल अधिकार पर्यवेक्षक मंच कि स्थापना बिल्कुल सामयिक है.
भारत के सभी राज्यों में मध्य प्रदेश शिशु मृत्यु दर और बाल कुपोषण के मामले में सबसे ऊपर है जबकि मातृ मृत्यु दर में उसका स्थान तीसरा है.
कन्या भ्रूण हत्या के मामले में भी मध्य प्रदेश स्थिति अन्य राज्यों से बेहतर नहीं है.
बच्चों के अधिकारों के लिए काम कर रही संस्थाओं का बार बार कहना है कि लैंगिक समानता और बच्चों का कल्याण आपस में जुड़े हुए हैं.