विनोद वर्मा
बीबीसी संवाददाता, गुजरात से लौटकर
वैसे तो गुजरात चुनाव में भाजपा और कांग्रेस के बीच सीधी लड़ाई दिखती है. लेकिन अगर आप दक्षिण गुजरात के कुछ ज़िलों में जाएँ तो एक तीसरा कोण नज़र आने लगता है.
यह न्यून कोण है और इतना छोटा है कि लोगों की नज़र भी नहीं जा पाती.
और यह कोण है जनता दल (छोटू) का.
चौंकिए नहीं यह कोई नई पार्टी नहीं है, है तो यह जनता दल (यूनाइटेड) की प्रदेश इकाई ही लेकिन इसके प्रदेश अध्यक्ष छोटू भाई वसावा का क़द ऐसा है कि पार्टी को लोग उनके ही नाम से जानते हैं.
छोटू भाई वसावा आदिवासी इलाक़ों के नेता हैं जहाँ वसावा आदिवासियों की बहुलता है. उनका राजनीतिक प्रभाव दो ज़िलों में अच्छा ख़ासा दिखता है. एक भरूच में और दूसरा नर्मदा ज़िले में.
छोटू भाई वसावा को उनके समर्थक ‘मसीहा’ और ‘भगवान’ जैसी उपमाएँ देते हैं और उनके बारे में ‘रॉबिनहुड’ जैसी बातें करते हैं. उनके विरोधी उन्हें उसी तरह देखते हैं जिस तरह उत्तरप्रदेश और बिहार में ‘बाहुबलियों’ को देखा जाता है.
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अंकलेश्वर में पिछले आठ सालों से पत्रकारिता कर रहे दिग्विजय पाठक बताते हैं कि एक पूरा इलाक़ा बाबू भाई के इशारे पर चलता है.
दिग्विजय कहते हैं कि इस इलाक़े के उद्योगपति उनकी मर्ज़ी के बिना कुछ नहीं कर पाते. वे उदाहरण देकर बताते हैं कि वे ‘नर्मदा स्कूटर्स’ से नाराज़ हो गए तो फिर मालिकों को उद्योग समेटना ही पड़ गया.
भरूच ज़िले का एक और क़स्बा है नेत्रंग. यहाँ के एक व्यावसायी और कांग्रेस के नेता शकूर भाई पठान कहते हैं कि छोटू भाई वसावा 15 सालों से विधायक बन रहे हैं लेकिन उन्होंने आदिवासियों के लिए कुछ नहीं किया.
उनका आरोप है, “उन्होंने आदिवासियों को उकसाकर दूसरों की ज़मीनों पर कब्ज़ा कर लिया और फिर सारी ज़मीन ख़ुद हड़प लीं. उनके पिता के पास तेरह एकड़ ज़मीन थी लेकिन इसके पास 25 सौ एकड़ ज़मीन है.”
हालांकि शकूर भाई पठान इस बात का सीधा जवाब नहीं दे पाते कि ऐसा था तो वे पिछला तीन चुनाव कैसे जीत गए. वे कहते हैं कि वे चुनावी गड़बड़ी से जीतते आए हैं.
छोटू वसावा के ख़िलाफ़ कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ रहे चंदू भाई वसावा आरोप लगाते हैं कि छोटू भाई ने अपने प्रतिद्वंद्वियों को प्रताड़ित किया और अपने पूरे परिवार को राजनीति में खड़ा कर दिया.
छोटू भाई वसावा पर कई मामले मुक़दमे चल रहे हैं. जिसमें हत्या के भी मामले हैं. एक बार पुलिस उन्हें गिरफ़्तार भी कर चुकी है.
'ग़रीबों का मसीहा'
हालांकि जनता दल (यूनाइटेड) के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव इन आरोपों का खंडन करते हैं. वे कहते हैं कि छोटू भाई वसावा वैसे नहीं हैं जैसे कि बिहार में बाहुबली होते हैं.
बीबीसी से हुई बातचीत में उन्होंने कहा, “वह ग़रीबों के लिए लड़ता है. लेकिन वह ख़ुद हथियार नहीं उठाता, हत्याएँ नहीं करवाता.”
वे कहते हैं राजनीति में ग़रीबों की जगह है नहीं और जो उनके लिए लड़ता है उसे फँसा दिया जाता है. शरद यादव कहते हैं, “हम पर भी तो कितने मामले चल रहे हैं.”
बाबूभाई वसावा माजलीपुरा में फार्महाउस जैसे एक घर में रहते हैं. वहाँ सैकड़ों आदिवासी समर्थकों से घिरे हुए वे शांत नज़र आते हैं.
गुंडागर्दी से लेकर ज़मीन हड़पने तक के आरोपों पर वे कहते हैं, “मुझसे मत पूछिए, आप आसपास के गाँवों में जाकर लोगों से बात कीजिए.”
उद्योगों को धमकाने के आरोपों पर वे कहते हैं कि आदिवासियों की ज़मीनों पर उद्योग लगें तो क्या आदिवासी अपने लिए कुछ न माँगें?
यह पूछने पर कि आपको लोग रॉबिनहुड कहते हैं, उनके चेहरे पर ख़ुशी की लहर दौड़ जाती है, फिर वे कहते हैं, “लोगों से पूछिए.”
मालजीपुरा के आसपास के बारह-पंद्रह गाँवों में लोग मिले जिन्होंने खुलकर कहा कि छोटू वसावा उनके लिए लड़ने वाला नेता है.
डटीलाल कहते हैं, “छोटू भाई वसावा हम ग़रीबों के लिए लड़ता है. वह हमारा दाता है. वह हम ग़रीबों का मसीहा है.”
लेकिन जो उनकी तारीफ़ नहीं करते वो छोटू भाई के ख़िलाफ़ कुछ कहते भी नहीं. शायद उनके डर से.
छत्तीस सीटें
जनता दल (यूनाइटेड) इस बार 36 सीटों पर चुनाव लड़ रहा है.
झगड़िया सीट से ख़ुद छोटू भाई वसावा चुनाव लड़ रहे हैं. पड़ोस की डेडियापारा से उनके बेटे महेश वसावा विधायक हैं और फिर एक बार मैदान में हैं और नांदोद सीट से दूसरे बेटे दिलीप वसावा लड़ रहे हैं.
चुनाव को नज़दीक से देख रहे लोगों को लगता है कि इन तीनों सीटों पर वसावा परिवार की स्थिति मज़बूत है. इसके अलावा वे एक-दो सीटें और जीतने की स्थिति में हैं.
विश्लेषकों को लगता है कि सत्ताधारी भाजपा का रुख़ छोटू भाई वसावा की ओर कुछ नरम है क्योंकि भाजपा ने जो उम्मीदवार इन तीनों सीटों पर उतारें हैं उसे वे कमज़ोर मानते हैं.
उनको लगता है कि चुनाव के बाद की संभावित ज़रुरतों की हिसाब से भाजपा उन्हें साधे रखना चाहती है.
हालांकि जनता दल (यूनाइटेड) के राष्ट्रीय अध्यक्ष कहते हैं कि एनडीए में वे ज़रुर भाजपा के साथ हैं और बिहार में साझा सरकार चल रही है लेकिन गुजरात में कोई समझौता नहीं है और अगर सरकार में साथ जाने की बात आई तो यह अभी तय नहीं है कि वे सरकार में चले ही जाएँगे.
जब टक्कर को काँटे का बताया जा रहा हो तो छोटी-छोटी पार्टियाँ की भूमिकाएँ भी अहम हो जाया करती हैं. और लगता है कि जनता दल (छोटू) को उसी दिन का इंतज़ार है.