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शनिवार, 08 दिसंबर, 2007 को 16:58 GMT तक के समाचार

रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी संवाददाता, लखनऊ

बारह साल जेल काटकर पाक चला शरीफ़

पाकिस्तान के रहने वाले मोहम्मद शरीफ़ ने 24 साल की छोटी सी जिंदगी में इतने छल, कपट, फ़रेब और दुख झेले हैं कि सुनने वालों को रोना आ जाए.

पाकिस्तानी शहर कराची के पास की बस्ती मलिर के रहने वाले मोहम्मद शरीफ़ को दुख देने वाला और कोई नहीं बल्कि अपना ही भाई था.

शरीफ़ ने अपनी ज़िंदगी के 12 साल सऊदी अरब और भारत की जेलों में गुज़ार दिए. उसने जो आपबीती सुनाई, वह मानवीय रिश्तों को शर्मसार कर देती है.

दर्द की दास्तां...

शरीफ़ के सौतेले भाई अब्दुल गफ़्फूर की सउदी अरब के शहर जेद्दा में दर्ज़ी की दुकान है. संपत्ति हड़पने के मक़सद से महज़ सात साल की उम्र में शरीफ़ को लेकर सौतेला भाई जेद्दा चला गया था.

शरीफ़ का कहना है कि उसके भाई ने अपनी पत्नी के साथ बलात्कार का आरोप लगाया और शरीफ़ को इस मामले में मौत की सज़ा सुनाई गई.

सज़ा के ख़िलाफ़ शरीफ़ की अपील पर चिकित्सकों ने उसकी जाँच करने के बाद पाया कि जिस उम्र में उस पर ये आरोप लगाए गए, उस उम्र में बलात्कार कर पाना संभव ही नहीं है.

भारत में भी निराशा

इसके बाद शरीफ़ को उसके भाई ने जाली भारतीय पासपोर्ट रखने के आरोप में जेल भिजवा दिया.

दो साल जेल में रहने के बाद शरीफ़ को सऊदी अरब के अधिकारियों ने मुंबई भेज दिया.

मुंबई में शरीफ़ को किसी ने बताया कि वह पाकिस्तान के लिए लखनऊ से ट्रेन पकड़ सकता है लेकिन लखनऊ आकर उसे निराशा ही हाथ लगी और उसने थक-हारकर पुलिस के सामने आत्मसमर्पण कर दिया.

दस साल तक सलाखों के पीछे रहने के बाद एक स्थानीय अदालत ने अपने फ़ैसले में शरीफ़ को बेगुनाह करार दिया.

शरीफ़ को पाकिस्तान भेजने के लिए कोर्ट ने शरीफ़ को काकोरी पुलिस के हवाले कर दिया.

पुलिस ने लिखा पढ़ी की तो पाकिस्तान सरकार ने उसे वहाँ का नागरिक मानने से इंकार कर दिया.

ऐसे मे लखनऊ के टेलर मास्टर मोहम्मद इदरिस उसके लिए मसीहा बनकर सामने आए जिनकी ससुराल कराची में है.

इदरिस कराची गए और उसके माँ-बाप से मिले. शरीफ़ के जिंदा होने की बात सुनकर उसके पिता मोहम्मद इशहाक तो बेहोश ही हो गए थे.

फिर वहां से दस्तावेज लेकर इदरिस भारत लौटे. पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग ने भी दिल्ली में पाकिस्तानी उच्चायोग को लिखा.

इस काम में भी तीन साल बीत गए और अब जब दिसंबर 2007 में उसे पाकिस्तान भेजने का इंतज़ाम किया गया तो तब तक उसके पिता की मौत भी हो चुकी है.

आख़िरकार लखनऊ से अमृतसर जाने वाली ट्रेन से शरीफ़ अपने देश के लिए निकल चुका है. वहाँ से बाघा सीमा होते हुए वह लाहौर और फिर कराची पहुंचेगा.

शरीफ़ को इस बात का दुख है कि वह अपने पिता की मौत के बाद उनके जनाज़े में नहीं शामिल हो सका. लेकिन माँ से मिलने की खुशी उसके चेहरे पर साफ झलक रही थी.

शरीफ़ ने कहा, "मेरी माँ की तो होश ही उड़ जाएगी और मैं तो होश में रहूँगा ही नहीं. मैं तो बेहोश हो जाऊँगा. कितने सालों के बाद मिलेंगे."