शनिवार, 01 दिसंबर, 2007 को 15:51 GMT तक के समाचार
अविनाश दत्त गर्ग
बीबीसी संवाददाता, अहमदाबाद से
एक पुरानी कहावत है, "नया नौ दिन, पुराना सौ दिन". शायद यही गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के लिए लागू होता है.
मोदी अपने राजनैतिक जीवन का तीसरा चुनाव तीसरी बार गुजरात के मुख्यमंत्री बनने के लिए लड़ रहे हैं.
राज्य की राजधानी अहमदाबाद पहुँचते ही भारतीय जनता पार्टी के चुनावी विज्ञापन पर मेरी निगाह पड़ी वो था,
" टक्कर है आतंकवाद के ख़िलाफ़,
मुम्बई, दिल्ली, हैदराबाद, काशी, अजमेर,
अमरनाथ, रेल, बस, सिनेमा, बाज़ार,
देश जिस में खेत रहे हज़ार,
पर छू न पाए गुजरात"
इन लाइनों के ठीक नीचे तस्वीर छपी हुई है जिसमें मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी मुट्ठी बांधे हुए हैं.
इस विज्ञापन के पहले भाजपा की तरफ़ से एक और विज्ञापन छापा था जिसमें कहा गया था की गोधरा दंगो की जांच के लिए केंद्रीय रेल मंत्रालय की तरफ़ से बनी समिति गुजरात के घावों पर नमक के समान है.
कांग्रेस ने इस विज्ञापन पर केंद्रीय चुनाव आयोग में आपत्ति जताई है. कांग्रेस की इस प्रतिक्रिया पर गुजरात में डेरा डाले पड़े भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रकाश जावड़ेकर बोले, "यह कांग्रेस ही है जो अफ़ज़ल को भी फाँसी नहीं देती और गुजरात में भी गोधरा के आरोपियों को बचा रही है. वरना जस्टिस बनर्जी समिति कहाँ से आई किस न्यायिक प्रक्रिया के तहत बनी ये समिति जिसने बिना सबूत देखे यह कह दिया की साबरमती एक्सप्रेस में आग अंदर से लगी."
पर कांग्रेस जो राज्य में सत्ता से 1995 से बाहर है इस की तरह के सवालों पर भाजपा पर पलटवार तो करती है पर मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी पर सीधे हमला करने से बचती है.
पार्टी की गुजरात इकाई के प्रभारी राष्ट्रीय सचिव मनीष तिवारी आतंकवाद पर भाजपा का इतिहास दिखाते हैं. " कंधार में कौन आतंकवादिओं को छोड़ कर आया? किस सरकार के समय रघुनाथ मन्दिर और संसद पर हमले हुए?"
वह यह भी दावा करते हैं कि 'एनडीए की सरकार के पाँच सालों के ख़राब काम के कारण देश में आतंकवाद मज़बूत हुआ है'.
कांग्रेस तो नरेन्द्र मोदी की राजनैतिक कवायद का जवाब दे रही है. पर नरेन्द्र मोदी तो महज़ कुछ दिन पहले तक नामी गिरामी पत्रकारों को गोधरा की बात करने पर झाड़ रहे थे.
मोदी लगातार कह रहे थे की गुजरात में इतिहास नहीं पिछले पाँच सालों में हुआ विकास देखो. टाइम्स ऑफ़ इंडिया के अहमदाबाद संस्करण के संपादक भरत देसाई कहते हैं, "मोदी भी आज यह जानते हैं की विकास की बात सारे मतदाताओं को आपील नहीं कर पाएगी. उनको ध्यान एक बार फिर गोधरा पर लाना पड़ेगा और इस बार उन्होंने इसके लिए आतंकवाद का रास्ता पकड़ना तय किया है"
देसाई यह भी कहते हैं की हो सकता है कि उनकी 2002 की जीत जिस तरह से गोधरा के कारण हुई थी उसी तरह से 2007 में भी हो, हांलांकि इस बार यह आतंकवाद के नाम पर होगी.
कांग्रेस की रणनीति का विश्लेषण करते हुए देसाई कहते हैं की उसकी आस तो भाजपा की अंदरूनी खींचतान पर टिकी है.
अब देखना यह है कि चुनाव को अपने चारों और बाँधे रखने में सफल मोदी क्या सत्ता को भी बाँधे रख पाते हैं!