गुरुवार, 29 नवंबर, 2007 को 14:35 GMT तक के समाचार
किरण बेदी
महानिदेशक, भारतीय पुलिस अनुसंधान एवं विकास ब्यूरो
नीली वर्दी में सुसज्जित भारतीय क्रिकेटर अपने ‘छक्कों’ और चौकों के साथ फार्म में लौट आए हैं. फिर चाहे मुक़ाबला ट्वेंटी-20 का हो, वनडे हो या फिर टेस्ट मैच. वास्तव में यह क्रिकेट का उत्सव है. देशभर में खुशी और उत्साह का माहौल है.
युवी के चौकों और छक्कों, सचिन के नब्बे से अधिक रन बनने पर हम सभी दर्शक खुश होते हैं और चीखते-चिल्लाते हैं, झंडे लहराते हैं और ठुमके लगाने का कोई मौका नहीं छोड़ते. फिर चाहे वह ट्वेंटी-20 की चीयर्स गर्ल्स हों या फिर हिलता-डोलता मोटा आदमी जैसा टेलीविज़न विज्ञापनों में नज़र आता है.
टिकट कहाँ से मिले
खचाखच भरे स्टेडियम में जश्न मनाने वाली इस भीड़ में सभी उम्र और भारी और हल्की जेबों वाले सभी लोग शामिल हैं. मैं यहाँ एक सवाल पूछना चाहती हूँ कि क्रिकेट की दीवानी ये भीड़ आखिर मैच देखने के लिए टिकट कहाँ से हासिल करती है?
पुलिस अधिकारी होने के नाते मेरा मानना है कि या तो बड़ी संख्या में कॉम्पलीमेंटरी टिकट बाँटे जाते हैं या फिर ऊँचे दामों के टिकट भरी जेबों वाले लोगों को दिए जाते हैं. सही में हमें कभी पता नहीं चल सका कि इस तरह टिकटों कि बिक्री से कितनी कमाई होती होगी या फिर टिकटों की बिक्री और इनका वितरण किस तरह होता है.
छात्रों और आम जनता के लिए बताई जाने वाली सस्ती टिकटें स्टेडियम के बाहर बेची जाती हैं. यहाँ टिकटों के लिए लंबी कतारें लगती हैं. टिकट के लिए पगलाई से इस भीड़ को अक्सर पुलिस को लाठियां भांजकर छितराना पड़ता है.
दिलचस्प बात ये है कि मँहगी टिकटें जहाँ आसानी से मिल जाती हैं, वहीं अधिकतर दर्शकों के लिए सस्ती टिकटें बहुत कम होती हैं. क्या हम स्थितियां बदल नहीं सकते? क्या हम स्टेडियम को भरने की मौजूदा व्यवस्था को बदल नहीं सकते?
क्या हम ज्यादा मौलिक नहीं हो सकते और ऐसी व्यवस्था नहीं बना सकते जिससे समाज के सभी वर्गों के लोगों को टिकट आसानी से मिल सकें? आतंकवादी हमलों की आशंका के मद्देनज़र क्या हम पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का काम और आसान और सुरक्षित नहीं बना सकते?
दर्शक मांग करें
मैं समझती हूँ कि हम ऐसा कर सकते हैं. बशर्ते सरकार इसके लिए स्पष्ट नीति बनाए और खेल संस्थाएँ और संगठन भी वास्तव में ऐसा ही चाहें. ख़ास और अहम बात ये कि दर्शक ऐसी व्यवस्था की ज़ोरदार माँग करें.
आइए देखें ऐसा कैसे हो सकता है?
हम तकनीक की मदद से ऐसा कर सकते हैं. सभी टिकट इंटरनेट के माध्यम से बेचे जा सकते हैं और इन्हें कहीं से भी किसी भी साइबर कैफ़े से हासिल किया जा सकता है. हाँ, इसके लिए डेबिट और क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल किया जा सकता है या फिर एसएमएस तकनीकी का भी बेहतर उपयोग हो सकता है.
इससे टिकटों की बिक्री और वितरण लोकतांत्रिक तरीके हो सकेगा और सही मायनों में ‘पहले आओ, पहले पाओ’ के आधार पर हो सकेगा.
इस व्यवस्था से लाभ ये होगा कि मैचों के लिए दर्शक सिर्फ़ स्थानीय ही नहीं होंगे, बल्कि देश और दुनिया के किसी भी कोने में मैच देखने का इच्छुक व्यक्ति अपने लिए टिकट हासिल कर सकेगा.
इससे एक और लाभ ये होगा कि ये स्टेडियम यकायक दुनिया के नक्शे पर आ जाएगा और पर्यटन और यात्रा से जुड़े अतिरिक्त राजस्व का लाभ स्थानीय लोगों को मिल सकेगा.
कुल मिलाकर टिकट बिक्री की व्यवस्था में पूरी तरह से पारदर्शिता आएगी. क्रिकेट और बॉलीवुड दो माध्यम हैं जो इंटरनेट को भारत के घर-घर में पहुँचा सकते हैं और इससे उपभोक्ताओं को दूसरी मूल्य आधारित सेवाएँ भी मिलने में भी सहायता मिलेगी.
मिसाल के तौर पर जयपुर में भारत-पाकिस्तान वनडे मैच के टिकटों की बिक्री इंटरनेट के जरिये की गई थी और दो परंपरागत प्रतिद्वंद्वियों की भिड़ंत देखने के इच्छुक क्रिकेटप्रेमियों ने अमरीका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड से मैच के टिकट खरीदे.
आगरा में चाट की दुकान चलाने वाला एक व्यक्ति ज्यादा पढा-लिखा नहीं था और इंटरनेट की उन्हें कोई जानकारी नहीं थी, लेकिन एक साइबर कैफ़े मालिक की सहायता से उन्होंने जयपुर वनडे का टिकट पा लिया और ट्रेन से जयपुर आ गए.
यह छोटी, लेकिन सही शुरुआत है और सभी संबंधित पक्षों के हित में है. दिल्ली में 2010 में होने जा रहे राष्ट्रमंडल खेलों को देखते हुए यह दर्शकों के लिए फ़ायदेमंद है. हमें हर चीज को आखिरी लम्हों के लिए नहीं छोड़ना चाहिए. व्यवस्थाओं को सुधारने पर अमल अभी से शुरू कर देना चाहिए.