http://www.bbcchindi.com

बुधवार, 28 नवंबर, 2007 को 12:26 GMT तक के समाचार

अविनाश दत्त
बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

भारत में लॉबिंग कितना कारगर?

भारत में लॉबिंग का इतिहास पुराना नहीं तो नया भी नहीं है. परमाणु मुद्दे पर आज जिस तरह की लॉबिंग हो रही है ऐसी लॉबिंग पूर्व सरकारों के कार्यकाल में भी हो चुकी है.

जब मोरारजी देसाई भारत के प्रधानमंत्री थे तब ब्रिटेन की सरकार ने चाहा था कि ब्रिटेन के कॉनकॉर्ड जहाज़ों को भारत के ऊपर से उड़ कर ऑस्ट्रेलिया जाने की अनुमति सरकार दे. भारत सरकार इसके ख़िलाफ़ थी.

ब्रिटिश सरकार ने भारत को मनाने के लिए काफ़ी मेहनत की. वहाँ के कूटनीतिज्ञों से लेकर एयरलाइंस के अधिकारियों तक हर किसी ने एड़ी-चोटी एक कर दिया था.

ये बात अलग है की यह क़वायद विफल रही. पर ये प्रयास भारत में, अगर अमरीकी भाषा में कहें, तो लॉबिंग यानि किसी विशेष मकसद के लिए राजनीतिक या हित समूहों के प्रयास की पहली बानगी थी.

अब इसका दूसरा उदाहरण देखने को मिला है भारत-अमरीकी परमाणु समझौते के मुद्दे पर. अमरीकी अधिकारियों से लेकर भारतीय वैज्ञानिकों और सेना के पूर्व प्रमुख इस समझौते के समर्थन या विरोध में खुल कर खड़े दिख रहे हैं. क्या यह लॉबिंग अब भारत में भी आ गई है?

कैंब्रिज शब्दकोष के मुताबिक लॉबिंग का अर्थ होता है- ऐसे प्रयास जो एक राजनेता, सरकार, या अधिकारिक समूह के ज़रिए कोई खास चीज करने या न करने के लिए मनाने, या क़ानून में फेरबदल करने के लिए किए जाएं.

परमाणु समझौता

अगर इस परिभाषा को मानें तो भारत में अमरीका के पूर्व विदेश मंत्री हेनरी किसिंजर, भारत में पूर्व अमरीकी राजदूत रॉबर्ट ब्लैकविल और अमरीकी वित्त मंत्री हेनरी पॉलसन सहित अमरीकी राजदूत, व्यापर जगत के लोग- मतलब हर वो अमरीकी या भारतीय जो इस समझौते से जरा भी जुड़ा है- इस समझौते के पक्ष या विपक्ष में प्रयास कर रहा है, राय बना रहा है या कहें लॉबिंग कर रहा है.

समझौते के समर्थक भारतीय नेताओं से मिलने वालों में भारत में अमरीका के पूर्व राजदूत रॉबर्ट ब्लैकविल भी थे. ब्लैकविल वर्तमान में अमरीका में भारत के अधिकारिक लॉबिंग करने वाले हैं.

न्यूयार्क टाइम्स की एक ख़बर के अनुसार ब्लैकविल को भारत ने इस काम के लिए पिछले सवा दो सालों में क़रीब 50 लाख रुपए दिए.

इत्तेफ़ाक से ब्लैकविल की फ़र्म ‘बार्बर ग्रीफ़िथ और रोजर्स’ अमरीकी लड़ाकू जहाज़ बनाने वाली कंपनी लाकहीड मार्टिन का भी प्रतिनिधित्व करती है. यह कंपनी भारत को हजारों करोड़ रुपयों के 125 एफ- 16 लड़ाकू जहाज़ बेचना चाहती है.

इसी कड़ी में 14 नवंबर 2007 को 15 पूर्व सेना प्रमुखों, भारतीय विदेश विभाग से जुड़े लोगो और अमरीका में भारत के कई पूर्व राजदूतों ने समझौते के समर्थन में एक खुला पत्र लिखा था.

आज़ाद भारत में यह शायद पहली बार हुआ की पूर्व सेना और सरकार के अधिकारी खुल कर किसी एक बात पर लामबंद हुए हो.

पूर्व जल सेना प्रमुख एडमिरल राम तहिलयानी, जो पत्र लिखने वालों में शामिल हैं इसे लॉबिंग नहीं कहते. "इसको हम कहते हैं अपनी राय देना. हम सब पूर्व सेना प्रमुख, वैज्ञानिक और पूर्व विदेश विभाग के अधिकारी सामूहिक रूप से अपनी राय दे रहे थे."

तहिलयानी का कहना है कि लॉबिंग तो वो होती है जिसमे पैसे का लेन-देन हो. यह क़दम तो स्वस्फूर्त था.

लेकिन इस समझौते के खिलाफ़ पूर्व विदेश मंत्री नटवर सिंह सवाल करते हैं " अगर यह लॉबिंग नहीं तो क्या है? आप अख़बारों को, सांसदों को पत्र लिख रहे हैं आप किसी को अपने घर पर खाने पर नहीं आमंत्रित कर रहे. उन्होंने कहा है की यह डील अच्छी है. अधिकारियों की राय में इसे मान लेना चाहिए".

हालांकि सिंह कहते हैं की इस प्रयास से फ़र्क नहीं पड़ने वाला है. पर वह यह भी कहते हैं की आज तक भारत में इस स्तर पर लौबिंग होती नहीं देखी गई. सिंह के अनुसार हर पक्ष चाहे वो मीडिया ही क्यों न हो किसी न किसी तरफ़ खड़ा दिख रहा है.

पर लॉबिंग में ऐसा क्या है कि सम्मानित लोग राय बनाने, नीति निर्माताओं को प्रभावित करने का प्रयास तो करते हैं पर इस शब्द के इस्तेमाल से बिदकते हैं.

ग़ैर क़ानूनी

मैंने कई विदेश मंत्रालय से पूर्व के अधिकारियों, पत्रकारों से बात की. हर किसी ने लॉबिंग के कई किस्से सुनाए पर किसी ने रिकॉर्ड पर बात नहीं की. शायद इसका कारण है की भारत में एक तो लॉबिंग ग़ैर क़ानूनी है और दूसरा यह शब्द आते ही दिमाग़ में तस्वीर उभरती है सत्ता के नज़दीक कुछ तांत्रिकों की, बाबाओं की और विदेशी हथियार दलालों की.

बात भले ही कोई न करे पर ये दिल्ली में सर्वव्यापी है. इसका महत्व पूछे जाने पर वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी कहते हैं की ऐसा इसलिए है क्योंकि सरकार का कोई निर्णय किसी एक औद्योगिक घराने को सबसे बड़ा घराना बना सकता है दूसरे को दुखी कर सकता है.

"एक वक़्त ऐसा था जब नॉर्थ ब्लाक और साउथ ब्लाक के सारे अधिकारी आर प्लस या आर माइनस के रूप में जाने जाते थे. आर प्लस वो जो रिलायंस का काम करते थे आर माइनस वो जो उसका काम नहीं करते थे."

प्रभाष जोशी या कई लोगो की नज़रों में लॉबिंग या पूर्व सेना प्रमुखों और अधिकारियों का परमाणु समझौते पर इस तरह पत्र लिखना ग़लत है. पर पत्र लिखने वालो के समर्थक भी हैं. पूर्व विदेश सचिव और उत्तर प्रदेश के पूर्व राज्यपाल रोमेश भंडारी इन्ही में से एक हैं. "यह तो बड़ी अच्छी बात है. हर आदमी को अधिकार है या कहिए की यह उसका कर्तव्य है की वो अपनी राय खुले रूप में व्यक्त करे".

पर क्या केवल उद्योग जगत ही लॉबिंग का सहारा लेता है? दिल्ली से छपने वाले अख़बार मेल टुडे के सह संपादक हरतोष सिंह बल समझाते हुए कहते हैं की लॉबिंग देशी और विदेशी दोनों क़िस्म की राय को प्रभावित करने के लिए हर तरह के लोग करते हैं.

वह गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी का उदाहरण देते हुए कहते हैं की उन्होंने एपको वर्लडवॉइड जैसी लॉबिंग फ़र्म की सेवाएँ ली हैं.यह फ़र्म कज़ाकिस्तान और नाइज़ीरिया जैसे देशों की तानाशाह सरकारों के लिए काम करती है. यह विदेशों से गुजरात के लिए पूँजी निवेश ला सकती है.

अब इस तरह की लॉबिंग भारत के लिए ग़लत है या सही ये तो लंबी बहस का मुद्दा है. पर यह तय है- लॉबिंग थी लॉबिंग है और लॉबिंग जितना दूर तक दिखता है उतने समय तक तो जाती नही दिखती. अब देखना यह है की आने वाले समय में इस स्तर पर और प्रयास भारत में दिखते हैं या नहीं.