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रविवार, 25 नवंबर, 2007 को 17:33 GMT तक के समाचार

'मुल्क़ से तानाशाही ख़त्म करने आया हूँ'

पाकिस्तान लौटने के कुछ ही देर बाद पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ ने कहा है कि वह मुल्क़ से तानाशाही ख़त्म करने आए हैं और वो लोकतंत्र मज़बूत बनाना चाहते हैं.

नवाज़ शरीफ़ का विमान रविवार रात लाहौर हवाई अड्डे पर उतरा. सऊदी अरब से उनके साथ उनकी पत्नी कुलसुम नवाज़ और भाई शाहबाज़ शरीफ़ भी आए हैं.

उन्होंने बीबीसी के साथ विशेष बातचीत में कहा, "हम देश में क़ानून का शासन चाहते हैं. हमें जम्हूरियत चाहिए और कुछ नहीं."

नवाज़ शरीफ़ का कहना था, "ये मेरी ज़िंदगी का बेहतरीन लम्हा है. मैं उन लोगों का शुक्रगुजार हूँ जिन्होंने मेरा साथ दिया."

पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि वो 1977 के संविधान की बहाली के लिए काम करेंगे.

उन्होंने स्पष्ट किया कि वो बदले की राजनीति के तहत आगे नहीं बढ़ेंगे. इस सवाल पर कि क्या वो जनरल मुशर्रफ़ के साथ मिल कर काम करेंगे तो उनका कहना था, "हमारा एजेंडा उनसे अलग है."

संसदीय चुनाव में हिस्सा लेने के सवाल पर उनका कहना था कि इसका फ़ैसला 'ऑल पार्टी डेमोक्रैटिक मूवमेंट' में शामिल अन्य दलों के साथ सलाह मशविरे के बाद ही किया जाएगा.

स्वागत

अपने परिवार के तीस सदस्यों के साथ पाकिस्तान पहुँचे नवाज़ शरीफ़ ने कहा कि उनका "परवेज़ मुशर्रफ़ से किसी तरह का समझौता करने का कोई इरादा नहीं है".

वे सात वर्ष निर्वासित ज़िंदगी गुज़ारने के बाद जेद्दा से एक विशेष विमान से लाहौर पहुँचे हैं.

सरकार की ओर से कहा गया है कि नवाज़ शरीफ़ अपनी मर्ज़ी से वापस लौटे हैं और उन्हें पिछली बार की तरह रोका या वापस नहीं भेजा जाएगा.

पिछले 10 सितंबर को इसी सरकार ने स्वदेश वापस लौटे नवाज़ शरीफ़ को हवाईअड्डे से ही वापस भेज दिया गया था.

हवाई अड्डे के लाउंज से बाहर निकलते ही पाकिस्तान मुस्लिम लीग (नवाज़) के समर्थकों ने उन्हें और शाहबाज़ शरीफ़ को कंधों पर उठा लिया और ज़बर्दस्त नारेबाज़ी की.

उन्होंने लोगों से कहा कि वो किसी सौदेबाज़ी के लिए वापस नहीं आए हैं बल्कि मुल्क़ और कौम के लिए वापस आए हैं.

हवाई अड्डे पर उनकी पार्टी के कार्यकर्ता लगातार जनरल मुशर्रफ़ के ख़िलाफ़ नारे लगाते रहे. पुलिस के साथ कार्यकर्ताओं की धक्कामुक्की भी हुई और हल्का लाठीचार्ज करना पड़ा.

कुछ दिन पहले पाकिस्तान के सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें स्वदेश लौटने की अनुमति दे दी थी.

1999 में नवाज़ शरीफ़ का तख़्ता पलट दिया गया था और अगले साल उन्हें पाकिस्तान से सऊदी अरब निर्वासित कर दिया गया था.