शनिवार, 24 नवंबर, 2007 को 09:29 GMT तक के समाचार
पाणिनी आनंद
बीबीसी संवाददाता, वाराणसी से
वाराणसी में शुक्रवार को न्यायालय में हुए बम विस्फोट में 12 साल का मासूम मनोज भी काल के ग्रास में समा गया जो जूते पॉलिश कर अपने भरे पूरे परिवार का गुजारा चलाता था.
उसकी मौत के बाद परिवार के सामने रोटी का संकट खड़ा हो गया है.
ऐसा नहीं है कि मनोज के पिता नहीं हैं या वो कमाते नहीं. उसके पिता जिलाजीत लोगों के कान साफ करने का काम करते हैं लेकिन अपनी सारी कमाई वो शराब के नाम कर देते हैं. ऐसे में मनोज ही अपने परिवार की रोजी रोटी का एकमात्र सहारा था.
मनोज का परिवार बंजारा समुदाय से ताल्लुक रखता है. परिवार में माता पिता के अलावा चार बड़ी बहनें और एक छोटा भाई है जो अभी माँ की गोद में ही है. उसकी एक-दो बहनें भी विवाह के काबिल हैं.
गुजारा कैसे चलेगा
मनोज की मौत का समाचार मिलते ही उसकी माँ सावित्री और नाते रिश्तेदार एकत्र हो गए. सावित्री का रो रोकर बुरा हाल था. जहाँ एक ओर उसे अपने बेटे की मौत का गम था वहीं दूसरी ओर उसे ये चिंता खाए जा रही थी कि अब उसके परिवार का खर्चा कैसे चलेगा.
सावित्री ने बीबीसी से कहा, “मनोज घर का एक ही सहारा था. उसके बाप से कोई मदद नहीं मिलती. अब हम लोग क्या खाएंगें.”
मनोज न्यायालय में वकीलों और उनके मुव्किलों के जूते पॉलिश किया करता था और विस्फोट के समय भी वो लोगों को यह कहते सुना गया कि सुबह से कोई कमाई नहीं हुई है. साहब जूते पॉलिश करवा लो.
मनोज का शव कबीर चौराहा स्थित शिव प्रकाश गुप्त जिला चिकित्सालय में रखा हुआ है.
सरकार ने विस्फोट में मारे गए लोगों के परिवारजनों को सहायता राशि देने की घोषणा की है. कहीं ऐसा न हो कि ये राशि मनोज के जरूरतमंद परिवार के बजाए उसके पिता के हाथ लग जाए और वो इसे अपनी शराब पर न्यौछावर कर दें और परिवार भूखों मरने के कगार पर आ जाए.
गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के लखनऊ, वाराणसी और फ़ैज़ाबाद शहरों में अदालतों के पास सिलसिलेवार बम धमाकों में 13 लोग मारे गए हैं और कई अन्य घायल हुए हैं. वाराणसी में दो विस्फोटों में नौ लोगों की मौत हुई है और 45 लोग घायल हुए हैं.