बुधवार, 14 नवंबर, 2007 को 21:01 GMT तक के समाचार
हारून रशीद
बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ के नेतृत्व में नेशनल असेंबली यानी संसद ने 1971 के बाद पहली असेंबली है जिसने पाँच साल का अपना संवैधानिक कार्यकाल पूरा किया है.
लेकिन कई आलोचकों का कहना है कि इस असेंबली की हैसियत नुमाइशी या रबर स्टैम्प से ज़्यादा नहीं रही है.
यह असेंबली कई बार मरते मरते बची है, इसकी कड़ी आलोचना हुई लेकिन इसको क़ायम करने वाले इसे बनाए रखने में सफल रहे. कई लोग इसे ‘ऑक्सीजन’ पर रखी जाने वाली असेंबली भी क़रार देते हैं.
इससे पहले प्रधानमंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो ने 10 जनवरी 1977 को असेंबली 4 साल 8 महीने और 26 दिन पूरे करने के बाद भंग कर दी थी.
ऐतिहासिक
सिर्फ़ संवैधानिक काल पूरा करना ही इस असेंबली का कारनामा नहीं रहा बल्कि इसके आलोचकों के मुताबिक़ इसे दुनिया के ऐसे पहले सदन का सम्मान भी हासिल है जिसने एक फ़ौजी को राष्ट्रपति के तौर पर एक नहीं दो बार चुना और उनका सहयोग करने वाले व्यक्ति तीन बार प्रधानमंत्री निर्वाचित हुए.
382 सदस्यों के इस सदन के प्रदर्शन के बारे में 'सेंटर फ़ॉर सिविक एजुकेशन' के ज़फ़रुल्लाह खाँ से का कहना था कि सिर्फ़ कार्यकाल पूरा करना काफ़ी नहीं.
वे कहते हैं, "मैं सिर्फ़ तीन बातों का ज़िक्र करता हूँ जो खुले ज़ेहन की सोच के लिए बहुत ज़रूरी थीं, शिक्षा नीति, जिस पर कभी बहस नहीं हुई, विदेश नीति, जिसकी दिशा कुछ और तय की गई और वह गई किसी और ही दिशा में, इस पर बहस से भी किनारा किया गया, और क़ानून सिर्फ़ राष्ट्रपति के अध्यादेशों के ज़रिए बनाए गए."
ज़फ़रुल्लाह का कहना था कि इस असेंबली की नुमाईशी हैसियत ज़्यादा रही और उसने लोगों को कोई वास्तविक सहूलियतें नहीं दीं.
पाँच साल में इस नेशनल असेंबली ने सिर्फ़ 50 विधेयक पास किए जो बाद में बाक़ायदा क़ानून बने. सदन ने विभिन्न विषयों पर 62 प्रस्ताव पास किए जिनमें अंतिम प्रस्ताव इमरजेंसी लागू करने की पुष्टि थी.
विपक्ष की भूमिका
अगर विपक्ष के प्रदर्शन पर नज़र डालें तो विपक्ष की ओर से सदन में 226 प्रस्ताव पेश किए गए लेकिन मंज़ूर सिर्फ़ एक ही हुआ.
विपक्ष का नेता भी असेंबली के गठन के 18 महीने बाद तय किया गया.
ज़फ़रुल्लाह खां कहते हैं कि जिसे सरकारी विपक्ष का नाम दिया गया उसका योगदान संविधान के 17 वें संशोधन को भी मंज़ूर करने में भी रहा और वर्दी के साथ परवेज़ मुशर्रफ़ को राष्ट्रपति के चुनाव में भी उसका हाथ रहा.
फिर भी उनका मानना है कि विपक्ष की भूमिका तो तब दिखाई देती जब सरकार कोई काम कर रही होती.
जितनी सरकार का प्रदर्शन मायूस करने वाला रहा उतना ही विपक्ष का किरदार भी असंतोषजनक रहा.
सदन की बैठक में मंत्रियों की ग़ैर-मौजूदगी और कोरम पूरा न होने का मसला भी रहा. प्रधानमंत्री की उपस्थिति भी अपेक्षा से भी कम रही.
रिकॉर्ड
याद रहे कि संवैधानिक तौर पर असेंबली ने पांच वर्ष तो पूरे कर लिए लेकिन नियम के अनुसार आख़िरी साल में बैठकों की निश्चित संख्या पूरा करने में नाकाम रही.
असेंबली की एक साल में 130 दिन बैठकें होनी ज़रूरी हैं, इस असेंबली को इस शर्त को पूरी करने के लिए और 52 बैठक बुलानी ज़रूरी थी.
यही एक मात्र नियम नहीं जो पूरा नहीं हुआ.
जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ ने सदन की स्थापना के 14 महीने बाद विपक्ष के ज़ोरदार हंगामे के बीच सदन को संबोधित तो किया लेकिन उसके बाद उन्होंने एक भी बार सदन को संबोधित नहीं किया, यह कहकर कि यह 'शालीन नहीं' है.
असेंबली की तरह उसके स्पीकर चौधरी अमीर हसन भी एक ग़ैरमामूली रिकार्ड के मालिक रहे हैं.
उनके ख़िलाफ़ विपक्ष ने दो अविश्वास प्रस्ताव पेश किए और दोनों विफल हो गए.
आम नागरिकों की दृष्टि में यह असेंबली एक व्यक्ति के ही इर्द-गिर्द घूम रही थी.
इस्लामाबाद के डॉ. असलम राही कहते हैं कि अगर राष्ट्रपति चाहते तो यह असेंबली पाँच क्या दस बरस भी चल सकती थी. वह असेंबली के कामकाज से भी अधिक संतुष्ट नहीं दिखाई दिए.
असेंबली के आख़री बरसों में विपक्ष ‘ साथ दें या ना दें’ की उलझन में फँसा रहा. सिवाए पीपुल्स पार्टी के दूसरी विपक्षी पार्टियों ने उसे समय से पहले ही अलविदा कह दिया.
हालांकि स्पीकर चौधरी अमीर हसन के अनुसार असेंबली के कामकाज में सरकार और विपक्ष का रोल सराहनीय है.
उनका कहना है, "सारे तनाव और तल्ख़ियों के बावजूद सदन ने अपना किरदार भरपूर अंदाज़ में अदा किया."
इन सारी कमज़ोरियों के बावजूद सरकार इसे देश के इतिहास की बेहतरीन असेंबली क़रार देती है.
यह कहा जा सकता है कि 12वीं नेशनल असेंबली इससे पहले की असेंबली से अलग रही लेकिन वहीं उसे विवादित कहना भी ग़लत नहीं होगा.