मंगलवार, 13 नवंबर, 2007 को 18:02 GMT तक के समाचार
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य ने नंदीग्राम में सीपीएम कार्यकर्ताओं का बचाव करते हुए कहा है कि उन्होंने जो किया वह उन पर की गई कार्रवाई का जवाब था.
मंगलवार को कोलकाता में एक पत्रकारवार्ता में उन्होंने कहा कि नंदीग्राम में पहले तृणमूल कांग्रेस के हथियारबंद कार्यकर्ताओं ने सीपीएम कार्यकर्ताओं पर हमले किए थे और उन्होंने 'जैसा किया था वैसा ही पाया'.
वाममोर्चे के मुख्यमंत्री ने नंदीग्राम में हिंसा की ताज़ा घटनाओं के लिए अपनी विफलता मानने से इनकार करते हुए कहा है कि यदि केंद्र सरकार पहले ही केंद्रीय बल भेज देती तो यह सब नहीं होता.
उधर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने मंगलवार की शाम मुख्यमंत्री भट्टाचार्य से फ़ोन पर बात की है और नंदीग्राम की स्थिति की जानकारी ली है.
इस बीच राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने राज्य सरकार से नंदीग्राम पर रिपोर्ट मांगी है.
बचाव
बुद्धदेब भट्टाचार्य का कहना है कि उन्होंने केंद्र सरकार से 27 अक्तूबर को सीआरपीएफ़ भेजने की माँग की थी जबकि सरकार ने 12 नवंबर को केंद्रीय बल भेजा.
समाचार एजेंसी यूएनआई के अनुसार उन्होंने कहा, "यह मेरी विफलता नहीं है, अगर केंद्र सरकार समय पर जवान भेज देती तो हम इस स्थिति को टाल सकते थे."
उनका कहना था कि सीपीएम के कार्यकर्ता अपने घरों से दूर थे और वे अपने घर लौटना चाहते थे.
जब उनसे पूछा गया कि सीपीएम के कार्यकर्ताओं ने घर लौटते हुए हिंसा की है, तो उन्होंने आरोप लगाया कि हथियारबंद तृणमूल कार्यकर्ताओं ने पहले सीपीएम के लोगों को घरों से खदेड़ा था.
उन्होंने कहा, "उन्होंने जैसा किया था वैसा ही पाया."
मुख्यमंत्री ने पलटकर पूछा, "क्या तृणमूल कांग्रेस के लोग शांत थे, क्या इससे पहले नंदीग्राम में सबकुछ शांत था?"
बुद्धदेब ने आरोप लगाया कि तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व में बने भूमि उच्छेद प्रतिरोध कमेटी (बीयूपीसी) के कार्यकर्ताओं को माओवादियों ने हथियार दिए हैं और प्रशिक्षण भी दिया है.
उन्होंने कहा कि केंद्रीय और राज्य की ख़ुफ़िया रिपोर्ट है कि रंजीत पाल के नेतृत्व में माओवादियों का एक दल नंदीग्राम में घुस गया है.
उन्होंने स्वीकार किया कि नंदीग्राम के इलाक़े में पुलिस नहीं जा पा रही है.
'तानाशाही की झलक'
पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ पत्रकार अमानुल्ला ने कहा है कि बिखरे हुए विपक्ष के बीच 31 साल से शासन कर रही सीपीएम को यह लगने लगा है कि उन्हें कोई चुनौती नहीं दे सकता और इसलिए बुद्धदेब के बयान से तानाशाह जैसी झलक मिल रही है.
बुद्धदेब के ताज़ा बयान पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस पार्टियाँ बिखरी हुई हैं और भाजपा का अस्तित्व ही संकट में है.
उनका कहना है कि 235 विधायकों के साथ विधानसभा में वाममोर्चे का पूर्ण बहुमत है और उनके हौसले बुलंद हैं.
अमानुल्ला ने कहा, "बुद्धदेब भट्टाचार्य मुख्यमंत्री की तरह नहीं बोल रहे थे. उनके भीतर सियासी अहम पैदा हो गया है और उनकी भाषा इसी को दर्शाती है. इसमें तानाशाही की भी झलक मिलती है."
उनका कहना है कि 1977 में सत्ता में आने के बाद सरकार ने पुलिस को ट्रेड यूनियन बनाने की अनुमति दे दी थी और तभी से पुलिस के लोग एक तरह से सीपीएम में शामिल हो गए हैं और सत्ता से साथ मिलकर कार्य कर रहे हैं.
"सीपीएम के बयानों से लगता है कि अब उसे माओवादी दुश्मन की तरह दिख रहे हैं."
रिपोर्ट माँगी
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट और सामाजिक कार्यकर्ता संजय पारिख की याचिका पर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने कुछ क़दम उठाए हैं.
संजय पारिख ने मेधा पाटकर की शिकायत के आधार पर ये याचिका मानवाधिकार आयोग को भेजी थी.
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के प्रमुख जस्टिस एस राजेन्द्र बाबू ने बीबीसी को बताया कि वो अब क्या करेंगे, “हमने तीन निर्देश दिये हैं – पहला पश्चिम बंगाल के प्रमुख सचिव से हमने रिपोर्ट माँगी है, हमने आयोग में जाँच करने वाली शाखा के प्रमुख डीआईजी, इंवेस्टीगेशन, को कहा है कि वो अपनी ओर से एक जाँच दल भेजें जो वहाँ की स्थिति के बारे में रिपोर्ट दे और तीसरा हमने भारत सरकार के गृह सचिव से कहा है कि वो सामान्य स्थिति बहाल करने के लिए समुचित क़दम उठाएँ और हमें दो हफ़्तों के अंदर इसकी रिपोर्ट भेजें.”
लेकिन जब बीबीसी संवाददाता ममता गुप्ता ने उनसे पूछा कि आप उस राज्य सरकार की रिपोर्ट पर कैसे विश्वास कर सकते हैं जिसके समर्थक नंदीग्राम में हुई हिंसा के लिए ज़िम्मेदार बताए जा रहे हैं, तो उन्होंने कहा, “पहले हमें जिसपर आरोप लग रहा है, उसको तो नोटिस देना ही होगा ना. अगर शेक्सपीयर के नाटक हैमलेट की बात करें तो डेनमार्क के राजकुमार हैमलेट के बिना क्या वो नाटक खेला जा सकता है. कुछ वैसी ही स्थिति पश्चिम बंगाल सरकार की है – हम उनसे उनका पक्ष भी जानना चाहते हैं.”