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मंगलवार, 13 नवंबर, 2007 को 15:28 GMT तक के समाचार

क्या सोच है आपातकाल के बारे में?

क्या सोचते है पाकिस्तानी लोग आपातकाल के बारे में. ख़बरें सुने-देखे बिना कैसा है उनका जीवन. जानते हैं कुछ लोगों के विचार-

वक़ास एम खटक, छात्र, इस्लामाबाद

"वर्तमान स्थिति से इस्लामाबाद में आम नागरिकों के लिए कोई समस्या खड़ी नहीं हुई है. आपातकाल से कोई फ़र्क नहीं पड़ा है.

व्यक्तिगत रूप से मैं समझता हूँ कि राष्ट्रपति परवेज़ मुशर्रफ़ ने एक अच्छा क़दम उठाया है.

पिछले महीनों में देश के हालात को देखते हुए मैं बहुत अवसाद में था. पिछले एक हफ़्ते से मैंने किसी बम धमाके की ख़बर नहीं सुनी है जबकि पहले प्रायः हर दिन धमाके होते थे.

इसका मतलब है कि आपातकाल अपना असर दिखा रहा है लेकिन इसे जल्दी समाप्त होना चाहिए."

अनाम, हाल ही में स्नातक, कराची

"जब से आपातकाल की घोषणा हुई है, देश के अंदर क्या घट रहा है इसे जानने का हमारे पास कोई ज़रिया नहीं है.

कुछ भिन्न स्रोतों से मैंने ख़बरें इकट्ठा करनी शुरू की हैं जिन्हें मैं क़रीब 500 लोगों को ई-मेल के ज़रिए भेजता हूँ.

विश्वविद्यालय के दो प्रोफ़ेसरों को ग़िरफ़्तार किया गया है जिनमें प्रसिद्ध अर्थशास्त्री अली चीमा भी हैं.

कराची में विरोध प्रदर्शनों को आयोजित करने में भी मैं सक्रिय हूँ. वकीलों, छात्रों, पेशेवरों और घरेलू स्त्रियों का हमारा एक समूह है. जब हम मिलते हैं, हमारे साथ कई अन्य लोग भी आ जाते हैं.

मुझे नहीं पता कि हम कोई बदलाव ला पा रहे हैं, लेकिन मुझे लगता है कि पूरे समाज को उठ खड़ा होना चाहिए. हर कोई एक बदलाव ला सकता है."

असमाँ जहाँगीर, मानवाधिकार आयोग, पाकिस्तान की प्रमुख, लाहौर

"मुझे 90 दिनों के लिए नज़रबंद कर रखा गया है. न तो मैं घर से बाहर जा सकती हूँ न ही कोई मुझसे मिलने आ सकता है.

उन लोगों ने मेरा मोबाइल फोन ले लिया है और मेरा इंटरनेट कनेक्शन काट दिया है.

मैं ख़ुशक़िस्मत हूँ क्योंकि मेरे अन्य सहयोगियों को क़ैद में डाल दिया गया है. उनकी हालत और भी ख़राब है. उन्हें अपने परिवार वालों से भी मिलने नहीं दिया गया.

अगर वे समझते हैं कि देश के वकीलों का मुँह बंद कर देंगें तो उनकी सोच ग़लत है.

वे जितने लोगों को क़ैद करेंगे उतनी ही ज़्यादा संख्या में अन्य लोग संघर्ष करने बाहर आएंगे.

कब तक यह चलेगा? वे पूरे नागरिक समाज से लड़ नहीं सकते. उन्हें गंभीरतापूर्वक अपने कर्मों पर पुनर्विचार करना पड़ेगा."

वसीम अफ़ज़ल, साँफ़्टवेयर इंजीनियर, लाहौर

"हमारे पास सूचना का कोई स्रोत नहीं है. हम सिर्फ़ बीबीसी, सीएनएन और अल जज़ीरा ऑनलाइन ही देख सकते हैं. इंटरनेट की स्पीड को उन्होंने धीमा कर दिया है जिसके एक पेज़ को लोड होने में काफ़ी वक़्त लगता है. ख़बरों के प्रसार को रोकने के कारण सब लोग दुखी है.

इस कारण हमने मूल रूप से अपनी व्यावसायिक साइट को न्यूज़ साइट में बदलने का निश्चय किया है. इसमें हमने विभिन्न न्यूज़साइट के स्रोत डाल रखे हैं. ऑडियो, वीडियो और लिखित ख़बरों को हम विभिन्न स्रोतों से चुनते हैं."

सारा हसन, पत्रकार, आज टीवी, इस्लामाबाद

"मैं आज टीवी के लिए आर्थिक मामलों पर रिपोर्ट करती हूँ. आपातकाल के बाद हमारे चैनल को बंद करवा दिया गया है.

मैं रोज़ पहले की तरह ही काम करती हूँ. रिपोर्ट भी करती हूँ लेकिन पाकिस्तान में कोई उसे देख नहीं सकता.

सरकार ने केबल ऑपरेटरों से प्रसारण का अधिकार छीन लिया है. सरकारी चैनल पीटीवी को छोड़ कर कोई अन्य राष्ट्रीय समाचार चैनल हम नहीं देख पाते हैं लेकिन पाकिस्तानी नागरिकों में ख़बरें जानने की काफ़ी चाह है.

कई लोगों ने अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय चैनलों को देखने के लिए सेटेलाइट डिश ख़रीदना शुरू कर दिया है.

चूँकि कोई ख़बर नहीं आ रही है, अपवाहों का बाज़ार गर्म है. इससे अर्थव्यवस्था प्रभावित होगी. सोमवार को ख़बरों के अभाव के कारण ही बाज़ार मे सहसा गिरावट आ गई."