शनिवार, 10 नवंबर, 2007 को 05:26 GMT तक के समाचार
सैयद शोएब हसन
बीबीसी संवाददाता, इस्लामाबाद
क्या पाकिस्तान के सैनिक शासक जनरल परवेज़ मुशर्रफ़ वापसी का रास्ते पर हैं?
15 फ़रवरी से पहले चुनाव कराने की उनकी घोषणा ने उनके नरम दृष्टिकोण का संकेत दिया है.
लोगों का मानना है कि बुधवार की रात को आए अमरीका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के फोन कॉल की इस घोषणा में अहम भूमिका हो सकती है.
राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने जनरल मुशर्रफ़ से कहा है कि उन्हें उम्मीद है कि वे पहले से तय समय पर ही चुनाव कराएँगे और सेना के प्रमुख पद से हट जाएँगे.
इसके साथ ही, व्हाइट हाउस ने यह कहकर दॉव खेला कि जनरल मुशर्रफ़ के साथ अमरीका की सहनशीलता “असीमित नहीं” है.
पाकिस्तान के हालात पर नज़र रखने वाले कहते हैं कि इसमें पूर्व प्रधानमंत्री बेनज़ीर भुट्टो का अंदरूनी दबाव भी सहायक बना.
उन्होंने जनरल मुशर्रफ़ के संविधान बहाली पर राज़ी न होने, चुनाव की घोषणा न करने और सेना प्रमुख से न हटने की स्थिति में अपने समर्थकों के सड़क पर उतरने की धमकी दी थी.
बेनज़ीर भुट्टो ने यह शर्त भी रखी थी कि आपातकाल के दौरान बनाए गए बंधकों को भी रिहा कर दिया जाए.
ग़िरफ़्तारियाँ
आपातकाल के दौरान सैकड़ों प्रदर्शनकारियों को गिरफ़्तार किया गया जिनमें छात्र, मानवाधिकार कार्यकर्ता, न्यायाधीश, वकील और विपक्षी नेता शामिल हैं.
इनमें बहुत सारे लोग हथियारों के साथ लूट और राजद्रोह के आरोपों के चलते अब भी कैद में हैं.
कुछ विश्लेषक मानते हैं कि गिरफ़्तार किए गए लोगों को रिहा करवाने के लिए अंतरराष्ट्रीय समुदाय को और भी ज़्यादा शोर मचाना चाहिए.
वे इंगित करते हैं कि राष्ट्रपति बुश के वक्तव्य ने एक बार फिर चुनाव और उनके सेना प्रमुख के पद को प्रमुखता दी.
एक विश्लेषक का कहना है कि यह सब जनरल मुशर्रफ़ की संतुष्टि के लिए है.
उधर, एक पाकिस्तानी नेता कहते हैं कि आपातकाल का प्रयोग आतंकवादियों के नाम पर उदारवादियों पर क़ानूनी कार्यवाही करने में किया गया है.
उनके अनुसार, आपातकाल लगाने के बाद सबसे पहला काम उन्होंने 30 कैदियों को रिहा करने का किया. इनमें छह आत्मघाती हमलों में शामिल होने के आरोपी थे.
वे वज़ीरिस्तान के कबायली इलाके में बंधक बनाए गए 300 सैनिकों के बदले सरकार द्वारा 30 तालिबान समर्थक आतंकवादियों की रिहाई का भी हवाला देते हैं.
विश्लेषकों का मानना है कि आपातकाल की घोषणा के कुछ ही घंटों के अंदर आतंकवादियों की रिहाई को भुला दिया गया.
दो घोड़ों की रेस
पाकिस्तानी नेता के अनुसार, राष्ट्रपति मुशर्रफ़ का सेना प्रमुख के पद से हट जाने का वायदा भुट्टो के साथ शक्ति समझौते के लिए चल रहे सौदों का प्रमुख बिंदु था.
वे कहते हैं कि सबसे बड़ी समस्या न्यायाधीश थे जो उन्हें राष्ट्रपति मानने को तैयार नहीं थे. और कानून में इसकी अनुमति के लिए कोई गुंजाइश नहीं थी.
सरकार की विफ़लताओं और ज़्यादतियों का बढ़-चढ़कर प्रचार करने वाला मीडिया भी अधिकारियों के लिए समस्या बन गया था.
अब यह एक ओर मुशर्रफ़ और उनके लोगों और दूसरी ओर बेनज़ीर और दूसरे लोगों के साथ स्पष्ट रूप से दो घोड़ों की रेस बन गई है.
भुट्टो की उपस्थिति जनरल मुशर्रफ़ के लिए परेशानी पैदा कर रही है और इसके कारण उन्हें अपना पद छोड़ना पड़ेगा. जबकि भुट्टो चाहती हैं कि उनकी पार्टी ही सत्ता में आए.
विश्लेषकों का कहना है कि बेनज़ीर भुट्टो के राजनीतिक विरोधी उनके और भी ज़्यादा आलोचक बन गए हैं और चाहते हैं कि वे ख़ुद को जनरल से दूर ही रखें.
विश्लेषक का कहना है कि अगले दो सप्ताह में एक साझा समझौता अमल में आ सकता है.