सुशील कुमार झा
बीबीसी संवाददाता, सुंदरबन, बांग्लादेश से
सुंदरबन की ख़ूबसूरती की तुलना असंभव है. जिस तरह नदियों से होते हुए हम यहाँ तक पहुँचे हैं, उसकी तुलना शायद अमेज़न के जंगलों से ही की जा सकती है.
इन जंगलों में सुबह-सुबह नौका पर सैर कीजिए तो आपको डॉल्फ़िन मछली देखने को मिल सकती है.
मेरी क़िस्मत उतनी अच्छी नहीं थी लेकिन मेरे कुछ साथियों ने डॉल्फ़िन अवश्य देखी.
पानी में साँप और विभिन्न प्रकार के गिरगिटों की भी बहुतायत है. नदी के सैर के बाद हमारी नौका के कप्तान ने कहा कि वे हमें ऐसे समुद्री तट पर ले जाएँगे जो ख़ास है.
आधे घंटे घने जंगलों के बीच पैदल चलकर जब हम तट पर पहुँचे तो समुद्र सामान्य ही लगा. तो फिर ख़ास बात क्या थी?
मैंने अपने कप्तान से पूछा तो उन्होने कहा, "आप इधर-उधर देखिए क्या आपको अपनी टीम के लोगों के अलावा और कोई दिखता है. ये उन समुद्र तटों में से है जहाँ साल भर में मुश्किल से 50 पर्यटक आते हैं. तभी यह तट इतना सुंदर और स्वच्छ है."
मैनें जीवन में ऐसा समुद्र तट कभी नहीं देखा था जहाँ भीड़ न हो.
लेकिन अब सात किलोमीटर तक मेरे पड़ोसी थे मेरी टीम के अलावा सुंदरबन के जंगल और उसके पशु-पक्षी.
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कटका अभ्यारण्य सुंदरबन के उन इलाकों में से है जहाँ का रास्ता छोटी-छोटी नहरों से होकर गुज़रता है.
यहाँ बड़ी तादाद में मिलते हैं सुंदरी पेड़ जिनके नाम पर ही इन वनों का नाम सुंदरबन पड़ा है.
इसके अलावा यहाँ पर देवा, केवड़ा, तर्मजा, आमलोपी और गोरान, ऐसी नस्लें हैं जो सुंदरवन में पाई जाती हैं.
जब मैं चमगादड़ देखने में व्यस्त था तब पैरों के पास से साँप गुजरा. मैंने ध्यान ही नहीं दिया, लेकिन मेरे साथ खड़े वन अधिकारी ने कहा, "पीछे हो जाइए, आप बाल-बाल बचे हैं."
जब नौका आगे की ओर चली तो पानी के किनारे हिरण और मगरमच्छ भी दिखें. बताया गया कि ये मगरमच्छ धूप सेंक रहे हैं.
यहाँ के वनों की एक ख़ास बात यह है कि यहाँ वही पेड़ पनपते या बच सकते हैं जो मीठे और खारे पानी के मिश्रण में रह सकते हों.
पर जलवायु परिवर्तन के कारण मीठे और खारे पानी का मिश्रण गड़बड़ा रहा है और पेड़ मर रहे हैं.
90 के दशक में चक्रवात से रेत आने के कारण भी कई पेड़ नष्ट हो गए.