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शनिवार, 27 अक्तूबर, 2007 को 17:59 GMT तक के समाचार

सलमान रावी
बीबीसी संवाददाता, राँची

झारखंड में नक्सली हमला, 18 मारे गए

झारखंड के गिरिडीह ज़िले में माओवादियों के एक हमले में राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी के बेटे अनूप मरांडी समेत 18 लोगों की मौत हो गई है.

इस घटना के विरोध में झारखंड विकास मोर्चा ने रविवार को राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया है.

बंद के मद्देनज़र राज्यभर में सुरक्षा के पुख़्ता इंतज़ाम किए जा रहे हैं.

उधर मुख्यमंत्री मधु कोड़ा ने मृतकों के परिजनों को एक-एक लाख रूपए का मुआवजा और परिवार के एक-एक सदस्य को सरकारी नौकरी देने की घोषणा की है.

गिरिडीह के पुलिस अधीक्षक अरुण कुमार सिंह ने बताया कि गिरिडीड से अस्सी किलोमीटर दूर चिलकारी गांव में एक समारोह के दौरान ये हमला हुआ था.

अरूण कुमार सिंह के अनुसार इस हमले में 18 लोगों की मौत हो गई है और दस से अधिक लोग घायल हैं.

चरम पर पहुंचा नक्सलवाद

शुक्रवार को आधी रात के बाद जब हमला हुआ तो वहाँ बाबूलाल मरांडी के भाई नूनुलाल मरांडी भी थे लेकिन वे बच निकलने में सफल रहे.

बाबूलाल के पुत्र अनूप की कुछ ही दिनों पहले शादी हुई थी.

घायलों में दो महिलाएँ और एक पुलिसकर्मी शामिल है.

बाबूलाल मरांडी और उनका पूरा परिवार पहले से ही माओवादियों के हिट लिस्ट में है.

हमला

पुलिस अधिकारी सिंह के अनुसार वहाँ पिछले चार दिनों से जनजातीय फ़ुटबॉल प्रतियोगिता चल रही थी और शुक्रवार की रात पुरस्कार वितरण हुआ.

इसके बाद अनूप मरांडी और नूनुलाल मरांडी दोनों गाँव में ही रुक गए थे.

पुलिस अधिकारियों ने गाँव वालों के हवाले से बताया है कि रात को माओवादियों ने गाँव को घेर लिया और फ़ायरिंग करने लगे.

इस फ़ायरिंग में अनूप मरांडी सहित 14 लोग मारे गए जबकि नूनु मरांडी किसी तरह बच निकलने में सफल रहे.

पुलिस का कहना है कि बाबूलाल मरांडी और उनका पूरा परिवार पहले से ही माओवादियों की हिटलिस्ट में है और आमतौर पर इन लोगों को किसी गाँव में ठहरने की सलाह नहीं दी जाती.

बाबूलाल मरांडी झारखंड के पहले मुख्यमंत्री थे और पहले भारतीय जनता पार्टी में थे.

बाद में उन्होंने भाजपा छोड़ दी थी और झारखंड विकास मोर्चा नाम की पार्टी बना ली थी.

वे इस समय कोडरमा से निर्दलीय सांसद भी हैं.

अतीत

सिख चरमपंथ और नक्सल हिंसा पर काफ़ी काम करने वाले पत्रकार और मेल टुडे के सह संपादक हरतोष सिंह बल बढ़ती नक्सली हिंसा की वारदातों पर कहते हैं ये मुख्यतः सरकार की कमजोरी का परिणाम है.

"चाहे वो प्रशासन की आर्थिक वैश्वीकरण और खुले बाज़ारों के लाभ ज़मीन तक पहुँचाने में नाकामी हो या नक्सल आक्रमण के ख़िलाफ़ कमज़ोर प्रतिक्रिया, इन सभी का माओवादी लाभ उठा रहे हैं.

हरतोष सिंह बल का कहना है की भले ही कुछ लोग इसे राजनीतिक और सामाजिक समस्या मानें पर उनके अनुसार यह पहले कानून व्यवस्था की समस्या है."

उनका कहना है कि सबसे पहले कानून व्यवस्था को ठीक करना होगा उसके बाद ही इस समस्या के राजनीतिक और सामाजिक पहलुओं पर काम शुरू हो सकता है और यहीं पर जहाँ केंद्र सरकार की भूमिका ख़राब है."

उनका मत है की हमेशा से ऐसा होता आया है की केंद्र और नक्सल प्रभावित राज्यों में अलग-अलग राजनैतिक दलों की सरकारें हैं, ऐसे मे केंद्र में बैठे लोग यह चाहते हैं की उनके विरोधी दल द्वारा शासित राज्य में हिंसा बढे, नतीजा समन्वय की कमी जिसके कारण एक राज्य में दबाव बढ़ने पर माओवादी दूसरे राज्य में भाग जातें हैं."