शनिवार, 27 अक्तूबर, 2007 को 08:51 GMT तक के समाचार
अल्ताफ़ हुसैन
बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर
जम्मू-कश्मीर में भारतीय सेना की मौजूदगी के साठ साल होने पर राज्य के कई अलगाववादी संगठनों ने शनिवार को विरोध स्वरूप भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में आम हड़ताल का आह्वान किया है.
इस हड़ताल के दौरान बंद की वजह से कश्मीर घाटी के ज़्यादातर इलाकों में दुकानें बंद हैं और यातायात पर भी असर पड़ा है.
ये अलगाववादी गुट राज्य के लोगों को स्वनिर्णय का अधिकार दिए जाने की मांग करते रहे हैं.
सेना का विरोध
1947 में भारत-पाकिस्तान बंटवारे के बाद पाकिस्तानी सेना के साथ पश्चिमोत्तर सीमा प्रांत के कबायलियों ने अक्तूबर में जम्मू-कश्मीर में हमला कर दिया था.
इस घुसपैठ का का मुक़ाबला करने के लिए भारतीय फ़ौजें 1947 में आज ही के दिन पहली बार जम्मू-कश्मीर भेजी गईं थीं.
बाद में संयुक्तराष्ट्र की मध्यस्थता से जनवरी 1949 में दोनों देशों के बीच युद्ध विराम हुआ. लड़ाई रूकने के बाद जिसके कब्जे में जो इलाका था उसे ही अस्थायी सीमा मान लिया गया था.
भारत का कहना है कि जम्मू-कश्मीर के राजा हरि सिंह के भारत में शामिल होने संबंधी समझौते पर दस्तख़त करने के बाद ही भारतीय फ़ौजों को वहां भेजा गया था.
जबकि कई इतिहासकारों का कहना है कि भारतीय फ़ौजों के वहां पहुंचने के बाद राजा हरि सिंह को भारत के साथ शामिल होने के लिए जबरन हस्ताक्षर कराए गए थे.
अलगाववादी गुटों का कहना है कि भारत सरकार ने विलय के वक्त किया अपना वो वादा नहीं निभाया है जिसमें इस विलय पर जनता की रायशुमारी कराने की बात कही गई थी.
गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर में पिछले 19 सालों में भारतीय फ़ौजों और अलगाववादी चरमपंथियों के बीच संघर्ष में अब तक हज़ारों लोग मारे गए हैं और बहुत से लोग लापता हैं.
हालांकि जम्मू-कश्मीर मसले को सुलझाने के लिए भारत-पाकिस्तान के बीच पिछले तीन चार सालों में बातचीत के कई दौर हुए हैं, लेकिन अब तक कोई ठोस हल नहीं निकला है.
इस बीच भारत के रक्षामंत्री एके एंटनी एक दिन की यात्रा पर जम्मू-कश्मीर पहुंचे हैं. वे वरिष्ठ सैन्य और पुलिस अधिकारियों के साथ राज्य की सुरक्षा स्थिति का जायजा लेंगें.