रामदत्त त्रिपाठी
बीबीसी संवाददाता, लखनऊ
उत्तर प्रदेश के अयोध्या में दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भड़के सांप्रदायिक दंगों के दौरान औद्योगिक शहर कानपुर में 11 मुसलमानों को ज़िंदा जलाने के आरोप में 15 हिंदुओं को उम्रक़ैद की सज़ा सुनाई गई है.
कानपुर के ज़िला और सत्र न्यायाधीश एसएम हसीब ने बुधवार को इन अभियुक्तों को सज़ा सुनाई.
इससे पहले सोमवार को न्यायालय ने इन अभियुक्तों को दोषी क़रार दिया था. बुधवार को अभियुक्तों की सज़ा के बारे में भी अदालत में कुछ बहस हुई.
अभियुक्तों में एक वकील भी हैं जिनका नाम पुष्पेंद्र यादव और जब उन्हें हथकड़ी पहनाए हुए अदालत में लाया गया तो कुछ वकीलों ने इस पर हंगामा किया.
ग़ौरतलब है कि अयोध्या में छह दिसंबर 1992 को कुछ हिंदू कट्टरपंथियों ने बाबरी मस्जिद को गिरा दिया था जिसके बाद देश के अनेक इलाक़ों में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे.
उन दंगों में दो हज़ार से ज़्यादा लोग मारे गए थे. कानपुर भी सांप्रदायिक दंगों का शिकार हुआ था.
अदालत ने पाया है कि कानपुर के गोविंद नगर इलाक़े में 10 दिसंबर 1992 को एक हिंदू भीड़ ने 11 मुसलमानों को ज़िंदा जला दिया था जिनमें दो महिलाएँ और एक बच्चा भी था.
अभियोजन पक्ष ने इस मुक़दमे के सिलसिले में 24 गवाह पेश किए जिनमें से दस आम लोग थे हालाँकि सभी आम गवाह अपने बयानों से पलट गए थे लेकिन कुछ पुलिसकर्मियों ने ऐसे सबूत अदालत में पेश किए जिनमें आगज़नी, दंगों और हत्या के इस मामले को बल मिला.
इस मामले में कुल 25 लोगों को अभियुक्त बनाया गया था लेकिन एक अभियुक्त की इस दौरान मौत हो गई.
मुक़दमे की सुनवाई और यह फ़ैसला आने में लगभग 15 साल का समय लगा है.
कानपुर के अतिरिक्त ज़िला और सत्र न्यायाधीश एसएम हसीब ने सोमवार को फ़ैसला सुनाया जिसमें 15 हिंदुओं को दोषी क़रार दिया गया है और उन पर दंड संहिता की विभिन्न धाराओं में आरोप साबित हुए हैं.
जज ने नौ अभियुक्तों को बरी कर दिया.
इस बीच अभियुक्तों के एक वकील योगेश भसीन ने कहा है कि अभियुक्तों के ख़िलाफ़ रिकॉर्ड पर कोई सबूत नहीं हैं और इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ हाई कोर्ट में अपील दायर की जाएगी.