बुधवार, 24 अक्तूबर, 2007 को 15:54 GMT तक के समाचार
उत्तराखंड में देहरादून की एक अदालत ने मधुमिता शुक्ला हत्याकांड में उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री अमरमणि त्रिपाठी और उनकी पत्नी समेत चार लोगों को उम्र क़ैद की सज़ा सुनाई है.
छह माह की गर्भवती मधुमिता शुक्ला की 9 मई 2003 को लखनऊ की पेपर मिल कालोनी में गोली मारकर हत्या कर दी गई थी.
डीएनए टेस्ट से साबित हुआ कि मधुमिता शुक्ला हत्या के समय अमरमणि त्रिपाठी के बच्चे की माँ बनने वाली थी.
ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश वीबी राय ने अमरमणि त्रिपाठी, उनकी पत्नी मधुमणि त्रिपाठी, संतोष राय और रोहित चतुर्वेदी को आजीवन कारावास की सज़ा और 50 हजार रुपए का जुर्माना किया गया है.
अदालत ने सबूतों के अभाव में एक अन्य अभियुक्त प्रकाश पांडे को बरी कर दिया.
मधुमिता शुक्ला की बहन निधि शुक्ला ने अदालत के इस फ़ैसले पर कहा है कि वह इसका सम्मान तो करती हैं लेकिन इस संतुष्ट नहीं हैं क्योंकि इस मामले के सभी अभियुक्तों को फाँसी की सज़ा होनी चाहिए थी.
निधि शुक्ला ने दिल्ली में पत्रकारों से बातचीत में कहा, "उम्रक़ैद का क्या है. सवाल ये भी है कि क्या अमरमणि त्रिपाठी क्या सचमुच उम्रक़ैद की सज़ा काटेगा या फिर कोई और हथकंडा इस्तेमाल करके खुली हवा में घूमता दिखाई देगा."
निधि शुक्ला ने कहा, "मैं अब बहुत चिंता में हूँ कि आगे क्या होगा क्योंकि आजकल इस तरह के आपराधिक छवि वाले राजनेता बहुत दुस्साहसी हो गए हैं और सज़ा होने के बाद भी चुनाव जीत जाते हैं. इसलिए मेरी चिंता बहुत बढ़ गई है."
निधि शुक्ला ने आम लोगों से अपील करते हुए कहा कि यह कोशिश की जाए कि इस तरह के लोग सज़ा काटते हुए भी नज़र आएँ ताकि अदालती व्यवस्था में आम लोगों का भरोसा बना रहे.
मधुमिता शुक्ला की माँ का कहना है, "अदालत के इस फ़ैसले से उन्हें कोई राहत नहीं मिली है क्योंकि अमरमणि त्रिपाठी जब जेल में था तो भी धमकियाँ आती थीं, गवाहों को तोड़ने और हमें हर तरह से परेशान करने की कोशिशें की गई हैं."
उन्होंने कहा है कि अमरमणि त्रिपाठी के सिर्फ़ जेल में रहने भर से कोई फ़र्क नहीं पड़ेगा क्योंकि वह वहाँ रहते हुए भी व्यवस्था का दुरुपयोग कर सकता है.
अभियोजन पक्ष ने अमरमणि और उनकी पत्नी को इस मामले में मुख्य अभियुक्त बनाते हुए उन पर मधुमिता की हत्या का षडयंत्र रचने का आरोप लगाया था.
स्थानीय पत्रकार शालिनी जोशी ने बीबीसी को बताया कि सीबीआई के वकील का कहना था कि अभियोजन पक्ष यानी सीबीआई अदालत के फ़ैसले से संतुष्ट हैं.
सीबीआई के वकील का कहना है कि उनके पास अभियुक्तों को दोषी सिद्ध करने के लिए पर्याप्त सबूत थे.
जाँच
इस मामले की शुरुआती जाँच लखनऊ पुलिस ने की थी. अमरमणि त्रिपाठी उस समय तत्कालीन मायावती सरकार में कैबिनेट मंत्री थे. तब विपक्षी दल समाजवादी पार्टी ने अमरमणि त्रिपाठी के ख़िलाफ़ ज़ोरदार प्रदर्शन किए थे.
बाद में इस मामले की जाँच पहले सीआईडी और फिर सीबीआई को सौंप दी गई.
मुक़दमे की सुनवाई लखनऊ की अदालत में शुरू हुई थी लेकिन इसी वर्ष फ़रवरी में मधुमिता की बहन निधि ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाख़िल कर इस मामले की सुनवाई उत्तर प्रदेश के बाहर स्थानांतरित करने का आग्रह किया था.
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए मामले की सुनवाई उत्तराखंड स्थानांतरित कर दी थी. अमरमणि त्रिपाठी इस समय उत्तर प्रदेश विधानसभा में समाजवादी पार्टी के विधायक हैं.
कुछ एजेंसियों के अनुसार नौ मई 2003 को मधुमिता लखनऊ में अपने निवास पर मृत पाई गई थीं. घटनास्थल से उनका लिखा हुआ लेकिन बिना किसी तारीख़ का एक पत्र मिला था जिससे उनकी मौत के बारे में सुराग़ मिलने में आसानी हुई.
उस पत्र में लिखा था, "चार महीने से मैं माँ बनने का सपना देखती रही हूँ. तुम इस बच्चे को स्वीकार करने से इनकार कर सकते हो लेकिन एक माँ के रूप में मैं ऐसा नहीं कर सकती. क्या मैं महीनों तक इस बच्चे को अपनी कोख में रखने के बाद इसकी हत्या कर दूँ? क्या तुम्हें मेरे दर्द का अंदाज़ा नहीं है, तुमने मुझे सिर्फ़ एक उपभोग की वस्तु समझा है."
मधुमिता शुक्ला के इस पत्र में जिस व्यक्ति को संबोधित किया गया है वह अमरमणि त्रिपाठी हैं और मधुमिता की कोख में जो बच्चा था वह उनका ही था जो डीएनए परीक्षण से साबित हो गया था.